1000 FIR में सिर्फ 6 गवाह! मऊगंज पुलिस की कार्य प्रणाली पर सवाल, CCTNS रिकॉर्ड से हुआ बड़ा खुलासा

1000 FIR में सिर्फ 6 गवाह! मऊगंज पुलिस की कार्य प्रणाली पर सवाल, CCTNS रिकॉर्ड से हुआ बड़ा खुलासा
January 13, 2026 at 4:14 pm

मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले में पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। गृह मंत्रालय की डिजिटल प्रणाली से सामने आए रिकॉर्ड बताते हैं कि बीते 25 वर्षों में दर्ज सैकड़ों मामलों में कुछ गिने-चुने लोगों को ही बार-बार सरकारी गवाह बनाया गया। हैरानी की बात यह है कि इन गवाहों की मौजूदगी एक ही समय में मीलों दूर स्थित अलग-अलग गांवों में दिखाई गई है।

यह खुलासा गृह मंत्रालय की क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स (CCTNS) परियोजना के तहत उपलब्ध एफआईआर डेटा की जांच में हुआ है। दस्तावेजों के अनुसार, मऊगंज जिले के लौर और नईगढ़ी थानों में वर्ष 2000 से अब तक दर्ज करीब 1,000 एफआईआर में महज छह व्यक्तियों के नाम बतौर गवाह बार-बार दर्ज किए गए हैं।

RTI से शुरू हुई जांच

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, आरटीआई कार्यकर्ता कुंज बिहारी तिवारी ने वर्ष 2022 में इस मामले की पहली शिकायत की थी। दिसंबर 2025 में उन्होंने विस्तृत दस्तावेजों के साथ दोबारा शिकायत दर्ज कराई। उनका आरोप है कि तत्कालीन थाना प्रभारी जगदीश सिंह ठाकुर ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए 150 से अधिक संदिग्ध एफआईआर दर्ज कराईं और कुछ चुनिंदा लोगों को गवाह बनाकर पुलिस कार्रवाई को वैध दिखाया।

‘सुपर गवाहों’ पर उठे सवाल

जांच में सामने आए छह नामों में अमित कुशवाहा प्रमुख है, जो संबंधित अधिकारी के तबादले के बाद भी उनके साथ अन्य थानों में मामलों में गवाह बनता रहा। अन्य नामों में सब्जी विक्रेता दिनेश कुशवाहा और ड्राइवर राहुल विश्वकर्मा शामिल हैं।

दिनेश कुशवाहा का कहना है कि उन्होंने केवल एक-दो मामलों में ही गवाही दी थी, जबकि कई केसों में उनका नाम उनकी जानकारी के बिना दर्ज किया गया। वहीं राहुल विश्वकर्मा के मुताबिक, वे केवल आरोपी की गिरफ्तारी के बाद थाने में दस्तखत करते थे, लेकिन सैकड़ों मामलों में गवाह बनाए जाने का दावा गलत है।

पुलिस पर कार्रवाई

मामले के सामने आने के बाद मऊगंज के पुलिस अधीक्षक दिलीप सोनी ने कार्रवाई करते हुए जगदीश सिंह ठाकुर को नईगढ़ी थाना प्रभारी पद से हटा दिया है। हालांकि, इस पूरे प्रकरण में कितनी गहराई से जांच होगी और दोषियों पर क्या सख्त कदम उठाए जाएंगे, इस पर अब सबकी नजर बनी हुई है।

यह मामला न केवल स्थानीय पुलिस प्रशासन की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में गवाहों की भूमिका और विश्वसनीयता को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा करता है।