बांकेबिहारी मंदिर ट्रस्ट अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, 15 जनवरी को होगी सुनवाई

बांकेबिहारी मंदिर ट्रस्ट अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, 15 जनवरी को होगी सुनवाई
January 15, 2026 at 3:11 pm

वृंदावन के प्रसिद्ध श्री बांके बिहारी मंदिर से जुड़े अध्यादेश 2025 को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 15 जनवरी को सुनवाई करेगा। यह याचिका मंदिर के सेवाधिकारियों की ओर से दाखिल की गई है, जो लंबे समय से मंदिर की देखरेख और पूजा-पद्धति का संचालन करते आ रहे हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लाए गए इस अध्यादेश का उद्देश्य वर्ष 1939 से लागू प्रबंधन व्यवस्था को बदलकर मंदिर को एक राज्य नियंत्रित ट्रस्ट के अधीन लाना है। सरकार का कहना है कि इससे मंदिर के संचालन में वित्तीय पारदर्शिता आएगी, सुरक्षा व्यवस्था बेहतर होगी और श्रद्धालुओं को आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकेंगी।

पिछली सुनवाई में क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने?

इस मामले की पिछली सुनवाई 15 दिसंबर 2025 को हुई थी। तब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा था कि “लोग भगवान को भी आराम नहीं करने देते।” कोर्ट ने दर्शन के समय में बदलाव और कुछ विशेष भक्तों को प्राथमिकता दिए जाने पर भी सवाल उठाए थे।

सुनवाई के दौरान मंदिर प्रबंधन समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अदालत को बताया था कि दर्शन का समय मंदिर की परंपराओं से जुड़ा हुआ है और यह केवल धार्मिक नहीं बल्कि भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने बांके बिहारी मंदिर उच्चाधिकार समिति और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई जनवरी 2026 में तय की थी।

क्या है बांके बिहारी मंदिर न्यास अध्यादेश 2025?

उत्तर प्रदेश सरकार ने वृंदावन स्थित विश्व प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर के प्रबंधन, सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधाओं में सुधार के उद्देश्य से “बांकेबिहारी मंदिर न्यास अध्यादेश, 2025” लागू किया है। सरकार का दावा है कि इस कानून से मंदिर की सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं और पूजा-पद्धति को बिना प्रभावित किए, वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित की जाएगी।

इस अध्यादेश के तहत एक ट्रस्ट का गठन किया गया है, जो मंदिर की संपत्तियों, चढ़ावे और प्रशासनिक कार्यों का संचालन करेगा। ट्रस्ट में 18 सदस्यीय न्यासी बोर्ड बनाया गया है, जिसे मंदिर के समग्र प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। साथ ही स्वामी हरिदास की परंपराओं को बनाए रखने पर भी जोर दिया गया है।

ट्रस्ट के वित्तीय अधिकार

अध्यादेश के प्रावधानों के अनुसार, ट्रस्ट 20 लाख रुपये तक के लेन-देन के लिए स्वतंत्र होगा। यदि किसी मद में इससे अधिक खर्च किया जाना है तो राज्य सरकार की अनुमति अनिवार्य होगी। सरकार का कहना है कि इस व्यवस्था से मंदिर प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ेगी और तीर्थयात्रियों को बेहतर एवं विश्वस्तरीय सुविधाएँ मिल सकेंगी।

अब सभी की निगाहें 15 जनवरी की सुनवाई पर टिकी हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह अध्यादेश मंदिर की परंपराओं और सेवाधिकारियों के अधिकारों के अनुरूप है या नहीं।