ग्रेटर नोएडा… जिसे उत्तर प्रदेश का हाईटेक हब कहा जाता है, वही शहर एक बार फिर प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक बन गया है। सेक्टर-150 में हुए दर्दनाक हादसे ने न सिर्फ एक परिवार का चिराग बुझा दिया, बल्कि सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता को भी बेनकाब कर दिया।
सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता (27) की मौत किसी सड़क हादसे से नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी से हुई — जहां मौके पर मौजूद 80 से ज्यादा रेस्क्यूकर्मी तमाशबीन बने रहे और एक युवा मदद के लिए तड़पता रहा।
कैसे हुआ हादसा?
शुक्रवार देर रात युवराज अपनी कार से सेक्टर-150 से गुजर रहे थे। घना कोहरा और अधूरी सड़क के कारण उनकी कार एक निर्माणाधीन मॉल के पानी से भरे बेसमेंट में जा गिरी।
घटना के समय:
80 रेस्क्यू कर्मी, फिर भी नहीं बची जान
घटना की सूचना पर:
लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि —
कोई भी पानी में उतरने को तैयार नहीं हुआ
बहाना बनाया गया – “पानीबहुतठंडाहै”, “अंदरसरियाहोसकताहै”
युवराज के पिता खुद पानी में कूदने को तैयार थे, लेकिन उन्हें रोक दिया गया।
एक स्थानीय डिलीवरी बॉय मुनेंद्र ने हिम्मत दिखाई और रस्सी बांधकर उतरने की कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में खुलासा:
फेफड़ों में 200 ML पानी – मौत की वजह डूबना और हार्टफेल्योर।
ग्रेटर नोएडा शिफ्ट होना पड़ा भारी
युवराज पहले गाजियाबाद में रहते थे, जहां से मेट्रो कनेक्टिविटी बेहतर थी।
नवंबर 2024 में उन्होंने ग्रेटर नोएडा शिफ्ट होने का फैसला लिया — जो उनकी जिंदगी का आखिरी फैसला बन गया।
दोस्तों के मुताबिक:
युवराज जल्द ही अपनी बहन के पास यूके शिफ्ट होने की तैयारी में थे।
10 साल से लटका प्रोजेक्ट बना मौत की वजह
जांच में सामने आया कि:
यानी मौत की वजह लापरवाही+ भ्रष्ट सिस्टम।
CM योगी का एक्शन
घटना के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सख्त कदम उठाए:
✅ नोएडा CEO लोकेश एम. हटाए गए
✅ जूनियर इंजीनियर नवीन कुमार सस्पेंड
✅ 3 सदस्यीय SIT का गठन
✅ 5 दिन में रिपोर्ट देने के आदेश
✅ मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों से पूछताछ
4 दिन बाद भी सवाल कायम
युवराज की बहन यूके में हैं, पासपोर्ट रिन्यू न होने से भारत भी नहीं आ सकीं।
बड़ा सवाल
क्या करोड़ों कमाने वाला नोएडा एक गोताखोर नहीं रख सकता?
क्या 80 लोगों की मौजूदगी में एक जान बचाई नहीं जा सकती थी?
क्या एक युवा की मौत की कीमत सिर्फ एक JE का सस्पेंशन है?
निष्कर्ष
ग्रेटर नोएडा हादसा सिर्फ एक एक्सीडेंट नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी का आईना है।
अगर समय रहते कार्रवाई होती — तो आज युवराज जिंदा होता।
सवाल अब भी कायम है —
क्या अगली जान जाने के बाद ही सिस्टम जागेगा?