उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत करीब 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटने के बाद सियासी तूफान खड़ा हो गया है। हैरानी की बात यह है कि जिस मुद्दे पर सत्ताधारी बीजेपी अपने ही मजबूत गढ़ों में वोटरों की संख्या घटने से असहज थी, उसी मुद्दे को अब विपक्ष ने बड़ा हथियार बना लिया है।
बीजेपी, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस—तीनों ही दलों का आरोप है कि उनके समर्थक वोटरों के नाम चुन-चुनकर हटाए जा रहे हैं। इस पूरे विवाद का केंद्र उत्तर प्रदेश बन चुका है, जहां करोड़ों मतदाताओं के नाम सूची से गायब बताए जा रहे हैं।
चुनाव आयोग के जारी आंकड़ों ने सबसे पहले बीजेपी की चिंता बढ़ाई। पार्टी का दावा है कि सबसे ज्यादा वोट कटौती उन्हीं सीटों पर हुई है, जिन्हें उसका अभेद्य किला माना जाता है। लखनऊ में लगभग 30 प्रतिशत, वाराणसी में 18 प्रतिशत और गोरखपुर में 17.61 प्रतिशत वोटरों के नाम सूची से हटने की बात सामने आई है। खुद मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक मंच से सवाल उठाया कि इतनी बड़ी संख्या में नाम कैसे हट सकते हैं।
जहां बीजेपी इसे प्रशासनिक चूक या तकनीकी प्रक्रिया का नतीजा बता रही थी, वहीं समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे सुनियोजित साजिश करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि ‘फॉर्म 7’ का दुरुपयोग कर विपक्षी वर्गों के वोट काटे जा रहे हैं। यह वही फॉर्म है जिसके जरिए किसी मतदाता का नाम हटाने का अनुरोध किया जाता है।
अखिलेश यादव का दावा है कि बड़ी संख्या में फर्जी फॉर्म भरे जा रहे हैं, जिनमें शिकायतकर्ता और मतदाता—दोनों की भूमिका एक ही व्यक्ति निभा रहा है। उनका आरोप है कि खासतौर पर पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग के मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने एक वीडियो भी साझा किया, जिसमें एक व्यक्ति यह दावा करता दिख रहा है कि उसके नाम से दर्जनों फॉर्म जमा कर दिए गए, जबकि उसने कभी ऐसा अनुरोध किया ही नहीं।
यह विवाद यहीं नहीं रुका। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी इसी मुद्दे को लेकर चुनाव आयोग के दरवाजे तक पहुंच गईं। उनका आरोप है कि बंगाल में भी जानबूझकर सत्तारूढ़ दल के विरोधी वोटरों के नाम हटाए जा रहे हैं। ममता ने इसे लोकतंत्र के खिलाफ साजिश बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विपक्ष अब वोटर लिस्ट की शुद्धता को आने वाले 2026–27 के चुनावों से पहले एक बड़े राष्ट्रीय मुद्दे के तौर पर खड़ा करने की तैयारी में है। संकेत साफ हैं—ईवीएम के बाद अब मतदाता सूची चुनावी बहस का अगला बड़ा अखाड़ा बनने जा रही है।