खरगोन का सिद्धनाथ महादेव मंदिर: 375 साल पुरानी आस्था, महाशिवरात्रि पर शयन दर्शन की अनोखी परंपरा

खरगोन का सिद्धनाथ महादेव मंदिर: 375 साल पुरानी आस्था, महाशिवरात्रि पर शयन दर्शन की अनोखी परंपरा
February 9, 2026 at 1:30 pm

मध्य प्रदेश के खरगोन में स्थित श्री सिद्धनाथ महादेव मंदिर आस्था और परंपराओं का अनोखा केंद्र माना जाता है। करीब 375 वर्ष पुराने इस मंदिर में महाशिवरात्रि का पर्व विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसी दिन भक्तों को साल में केवल एक बार भगवान शिव के शयन दर्शन का दुर्लभ अवसर मिलता है।

1651 में हुई थी मंदिर की स्थापना

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस प्राचीन शिव मंदिर की स्थापना सन 1651 में मल्लिवाल परिवार द्वारा की गई थी। बाबा सिद्धनाथ महादेव को खरगोन का अधिष्ठाता देव माना जाता है। यही कारण है कि महाशिवरात्रि पर यहां दूर-दराज से हजारों श्रद्धालु दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं।

महाशिवरात्रि पर तड़के 3 बजे खुलते हैं मंदिर के द्वार

मंदिर समिति के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन मंदिर के कपाट रात 3 बजे खोल दिए जाते हैं। ब्रह्म मुहूर्त में विशेष श्रृंगार आरती होती है, जिसके बाद पूरे दिन अभिषेक, रुद्राभिषेक और पूजन-अर्चन का क्रम चलता रहता है। श्रद्धालु बाबा से नगर की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।

दूल्हा रूप में सजते हैं बाबा, होती है भव्य महाआरती

शाम होते-होते भगवान शिव का विशेष श्रृंगार किया जाता है। उन्हें साफा पहनाकर दूल्हे के स्वरूप में सजाया जाता है। रात करीब 8:30 बजे भव्य महाआरती होती है, जिसमें हजारों भक्त शामिल होते हैं। इसके बाद साबूदाना खिचड़ी का प्रसाद वितरित किया जाता है, जो वर्षों पुरानी परंपरा है।

12 बजे मिलते हैं दुर्लभ शयन दर्शन

महाशिवरात्रि की रात ठीक 12 बजे भगवान शिव को शयन अवस्था में विराजमान किया जाता है। यही वह क्षण होता है, जब भक्तों को साल में एकमात्र बार शयन दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है। दिनभर महिलाएं दीप जलाकर भजन-कीर्तन करती हैं।

चौसर खेलने की रहस्यमयी मान्यता

मंदिर से जुड़ी एक रोचक मान्यता के अनुसार, रोज रात शयन आरती के बाद शिवलिंग के सामने चौसर बिछाई जाती है। सुबह जब मंदिर खुलता है, तो चौसर बिखरी हुई मिलती है। विश्वास है कि भगवान शिव माता पार्वती के साथ रात्रि में चौसर खेलने आते हैं।

सांप की समाधि पर स्थापित शिवलिंग

इस मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहां का शिवलिंग किसी सांप की समाधि पर स्थापित है। उस सांप का नाम सिद्धू बताया जाता है। आज भी महाशिवरात्रि के दिन मंदिर के शिखर पर ध्वजा चढ़ाने की परंपरा मल्लिवाल परिवार द्वारा ही निभाई जाती है।