उत्तर प्रदेश में लापता व्यक्तियों के मामलों को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। बीते करीब दो वर्षों में प्रदेशभर में 1,08,300 से अधिक गुमशुदगी की शिकायतें दर्ज हुईं, लेकिन इनमें से केवल 9,700 मामलों में ही ट्रेसिंग या तलाश की कार्रवाई की गई। यह गंभीर स्थिति तब उजागर हुई, जब एक पिता ने अपने लापता बेटे की तलाश के लिए पूरे सिस्टम को अदालत के कटघरे में खड़ा कर दिया।
यह मामला लखनऊ के गोमती नगर क्षेत्र के विकल्प खंड निवासी डॉ. विक्रमा प्रसाद से जुड़ा है। उनके 32 वर्षीय बेटे रंजन कुमार 15 जुलाई 2024 की शाम करीब 6 बजे घर से निकले थे और उसके बाद कभी वापस नहीं लौटे। परिवार के अनुसार, रंजन घर से निकलते वक्त न तो मोबाइल साथ ले गए थे और न ही पैसे। दो दिन बाद, 17 जुलाई 2024 को चिनहट थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई, लेकिन परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया।
पिता की याचिका, कोर्ट का सख्त रुख
पुलिस की कथित निष्क्रियता से निराश होकर पिता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में याचिका दाखिल की। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस तकनीकी सेवा मुख्यालय से प्राप्त आंकड़ों पर कड़ी हैरानी जताई। कोर्ट ने सवाल किया कि जब लाखों लोग लापता हैं, तो इतनी कम संख्या में ट्रेसिंग की कार्रवाई आखिर क्यों?
कोर्ट ने पुलिस के रवैये को “कैजुअल और कैवलियर” करार देते हुए राज्य सरकार से गृहविभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव से विस्तृत हलफनामा मांगा। साथ ही, इस याचिका को जनहित याचिका (PIL) के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया गया।
हजारों परिवार अब भी इंतजार में
कोर्ट ने साफ कहा कि लापता व्यक्तियों के मामलों में तेज और प्रभावी जांच जरूरी है, अन्यथा आम लोगों का न्याय व्यवस्था से भरोसा उठ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदेश में ऐसे हजारों मामले अब भी अनसुलझे हैं, जिनमें परिवार सालों से अपनों की राह देख रहे हैं।
हाईकोर्ट की इस सख्ती से उम्मीद की जा रही है कि राज्य सरकार और पुलिस तंत्र में सुधार की प्रक्रिया तेज होगी और लापता व्यक्तियों के परिजनों को न्याय और राहत मिल सकेगी।
यूपी में लापता लोगों का संकट: 1.08 लाख केस, सिर्फ 9,700 की तलाश — एक पिता की लड़ाई से कोर्ट तक पहुंचा मामला