राज्यसभा चुनाव नजदीक आते ही देश की राजनीति में एक बार फिर “रिजॉर्ट पॉलिटिक्स” चर्चा का विषय बन गई है। अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक दल अपने विधायकों को सुरक्षित स्थानों पर भेज रहे हैं ताकि चुनाव से पहले किसी भी तरह की टूट-फूट या क्रॉस वोटिंग को रोका जा सके। ताजा घटनाक्रम में कांग्रेस ने ओडिशा के विधायकों को बेंगलुरु भेजा है, जबकि हरियाणा के कांग्रेस विधायकों को हिमाचल प्रदेश के शिमला के पास एक रिजॉर्ट में ठहराया गया है। विपक्ष का आरोप है कि यह कदम खरीद-फरोख्त के डर से उठाया गया है, जबकि सत्तारूढ़ दल इस आरोप को राजनीतिक ड्रामा बता रहा है।
राज्यसभा की सीटों के लिए होने वाले चुनाव से पहले राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। जानकारी के अनुसार ओडिशा विधानसभा में कांग्रेस के कुल 14 विधायक हैं, लेकिन हाल ही में विधानसभा की कार्यवाही के दौरान केवल 5 विधायक ही सदन में नजर आए। बाकी 9 विधायक अचानक राज्य से बाहर चले गए, जिसके बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई। बाद में पार्टी की ओर से पुष्टि की गई कि इन विधायकों को बेंगलुरु भेजा गया है।
कांग्रेस विधायक दल के नेता रामचंद्र कदम ने कहा कि उनकी पार्टी को आशंका है कि विरोधी दल उनके विधायकों को तोड़ने की कोशिश कर सकता है। इसी वजह से सभी विधायकों को एक साथ सुरक्षित स्थान पर रखा गया है ताकि मतदान तक एकजुटता बनी रहे। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भक्त चरण दास भी बेंगलुरु में मौजूद बताए जा रहे हैं और वे लगातार विधायकों के संपर्क में हैं।
उधर हरियाणा में भी इसी तरह की स्थिति देखने को मिली। राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाले चुनाव से पहले कांग्रेस के करीब 37 विधायकों को बसों से हिमाचल प्रदेश भेजा गया। पहले उन्हें सोलन ले जाया गया और फिर वहां से शिमला के पास एक रिजॉर्ट में ठहराया गया। पार्टी सूत्रों का कहना है कि यह कदम एहतियात के तौर पर उठाया गया है ताकि कोई भी विधायक दबाव या लालच में आकर पार्टी लाइन से अलग मतदान न करे।
हरियाणा में मुकाबला इस बार दिलचस्प माना जा रहा है क्योंकि भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों के अलावा एक निर्दलीय प्रत्याशी के मैदान में उतरने से समीकरण बदल गए हैं। ऐसे में हर एक वोट की अहमियत बढ़ गई है और इसी वजह से राजनीतिक दल कोई जोखिम नहीं लेना चाहते।
भारतीय राजनीति में रिजॉर्ट पॉलिटिक्स कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी कई राज्यों में सरकार बचाने या चुनाव जीतने के लिए विधायकों को दूसरे राज्यों में ले जाकर रखा गया है। कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गोवा जैसे राज्यों में इस तरह की घटनाएं पहले भी सामने आ चुकी हैं।
राज्यसभा चुनाव में विधायकों के वोट के आधार पर सांसद चुने जाते हैं। पहले इस चुनाव में गुप्त मतदान होता था, जिससे क्रॉस वोटिंग की संभावना ज्यादा रहती थी। बाद में नियमों में बदलाव किया गया, लेकिन फिर भी राजनीतिक दलों को डर रहता है कि उनके विधायक आखिरी समय में पाला बदल सकते हैं।
इसी वजह से कई बार पार्टियां अपने विधायकों को होटल, रिसॉर्ट या दूसरे राज्य में ले जाकर रखती हैं ताकि वे विपक्ष के संपर्क में न आ सकें।
रिजॉर्ट पॉलिटिक्स का असर सिर्फ राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर लोकतंत्र की छवि पर भी पड़ता है। जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनकर विधानसभा भेजती है ताकि वे उनके मुद्दे उठाएं, लेकिन जब चुनाव से पहले उन्हें बंद कमरे में रखा जाता है तो यह सवाल उठता है कि क्या राजनीतिक दलों को अपने ही नेताओं पर भरोसा नहीं है।
इसके अलावा इस तरह की घटनाओं से सरकार पर खर्च का बोझ भी बढ़ता है। विधायकों को बाहर भेजने, रहने-खाने और सुरक्षा की व्यवस्था में भारी खर्च होता है, जिसकी आलोचना भी होती रहती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे जनता में यह संदेश जाता है कि राजनीति में सिद्धांत से ज्यादा संख्या का खेल चलता है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह कदम मजबूरी में उठाया गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता ने कहा कि विपक्ष द्वारा विधायकों को तोड़ने की कोशिशों की खबरें मिल रही थीं, इसलिए सभी को एक साथ रखा गया है।
वहीं भाजपा नेताओं ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कांग्रेस अपनी अंदरूनी कमजोरी छिपाने के लिए इस तरह का माहौल बना रही है। उनका कहना है कि अगर पार्टी को अपने विधायकों पर भरोसा है तो उन्हें छिपाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
रिजॉर्ट पॉलिटिक्स भारतीय लोकतंत्र की एक ऐसी सच्चाई बन चुकी है जिसे न तो पूरी तरह सही कहा जा सकता है और न ही पूरी तरह गलत। एक तरफ राजनीतिक दल इसे अपनी रणनीति बताते हैं, वहीं दूसरी तरफ इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ भी माना जाता है।
राज्यसभा चुनाव में अक्सर संख्या का अंतर बहुत कम होता है, इसलिए एक-दो वोट भी परिणाम बदल सकते हैं। यही वजह है कि दल अपने विधायकों को सुरक्षित रखने के लिए हर संभव तरीका अपनाते हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक राजनीतिक दलों में आंतरिक अनुशासन मजबूत नहीं होगा और दलबदल की प्रवृत्ति खत्म नहीं होगी, तब तक रिजॉर्ट पॉलिटिक्स जारी रहेगी।
राज्यसभा चुनाव से पहले हरियाणा और ओडिशा में विधायकों को दूसरे राज्यों में भेजे जाने की घटना ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि भारतीय राजनीति में भरोसे का संकट अभी खत्म नहीं हुआ है। पार्टियां जीत सुनिश्चित करने के लिए हर कदम उठा रही हैं, लेकिन इससे लोकतंत्र की छवि पर सवाल उठते हैं। आने वाले समय में यह देखना होगा कि क्या राजनीतिक दल इस परंपरा को खत्म करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाते हैं या रिजॉर्ट पॉलिटिक्स आगे भी जारी रहेगी।
1. रिजॉर्ट पॉलिटिक्स क्या होती है?
जब कोई राजनीतिक दल अपने विधायकों को किसी होटल या दूसरे राज्य में ले जाकर रखता है ताकि वे टूट-फूट से बचें, इसे रिजॉर्ट पॉलिटिक्स कहते हैं।
2. राज्यसभा चुनाव में इसकी जरूरत क्यों पड़ती है?
क्योंकि राज्यसभा चुनाव में विधायकों के वोट से परिणाम तय होता है और क्रॉस वोटिंग का डर रहता है।
3. हरियाणा में विधायकों को कहां भेजा गया है?
हरियाणा के कांग्रेस विधायकों को हिमाचल प्रदेश के शिमला के पास एक रिजॉर्ट में ठहराया गया है।
4. ओडिशा के विधायक कहां गए हैं?
ओडिशा के कांग्रेस विधायकों को बेंगलुरु भेजा गया है ताकि वे एकजुट रहें।
5. क्या रिजॉर्ट पॉलिटिक्स पहले भी हुई है?
हां, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं।
राज्यसभा चुनाव से पहले फिर तेज हुई रिजॉर्ट पॉलिटिक्स, हरियाणा से शिमला और ओडिशा से बेंगलुरु पहुंचे विधायक, खरीद-फरोख्त का डर या रणनीति?