दिल्ली सरकार द्वारा 10 मिनट में डिलीवरी के दबाव को लेकर लिए गए फैसले को डिलीवरी पार्टनर्स ने राहत भरा कदम बताया है। उनका कहना है कि पहले समय पर ऑर्डर पहुंचाने की होड़ में उन्हें अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती थी, जिससे सड़क हादसे और ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन आम बात हो गई थी।
एक डिलीवरी कर्मचारी ने बताया कि तेज डिलीवरी के दबाव में कई बार तेज रफ्तार से वाहन चलाना पड़ता था। इस कारण न केवल चालान कटते थे बल्कि कई कर्मचारियों को चोट तक लगती थी। उन्होंने कहा कि न तो इससे कर्मचारियों को कोई फायदा होता था और न ही कंपनियों को।
डिलीवरी पार्टनर्स का मानना है कि सरकार के इस फैसले से अब काम पहले से ज्यादा सुरक्षित हो गया है। कर्मचारी ने कहा, “अब हम कम डर के साथ सड़कों पर काम कर पा रहे हैं।”
हालांकि, सुरक्षा बढ़ने के बावजूद कमाई को लेकर कर्मचारियों की चिंता बनी हुई है। डिलीवरी पार्टनर्स के मुताबिक, पहले प्रति ऑर्डर उन्हें 35 से 50 रुपये तक मिल जाते थे, लेकिन अब यह घटकर 18 से 30 रुपये रह गया है। उनका कहना है कि काम का बोझ बढ़ रहा है, लेकिन भुगतान लगातार कम होता जा रहा है।
एक अन्य कर्मचारी ने बताया कि उन्हें रोजाना करीब 15 घंटे तक काम करना पड़ता है, लेकिन मेहनत के अनुपात में पैसे नहीं मिलते। इसके अलावा, उन्होंने कंपनियों के सिस्टम पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि छोटी-सी गलती पर आईडी ब्लॉक कर दी जाती है, जिससे उनकी आजीविका पर सीधा असर पड़ता है।
डिलीवरी पार्टनर्स ने सरकार के फैसले की सराहना करते हुए मांग की है कि अब कंपनियों की पेमेंट पॉलिसी, काम के घंटे और कर्मचारियों के अधिकारों पर भी ध्यान दिया जाए। उनका कहना है कि सुरक्षा के साथ-साथ न्यायपूर्ण भुगतान व्यवस्था लागू होगी, तभी यह फैसला पूरी तरह कर्मचारियों के हित में साबित होगा।