राजस्थान हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘नाता विवाह’ को मिली कानूनी मान्यता, महिला को पारिवारिक पेंशन का अधिकार

राजस्थान हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘नाता विवाह’ को मिली कानूनी मान्यता, महिला को पारिवारिक पेंशन का अधिकार
January 20, 2026 at 4:06 pm

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए ‘नाता विवाह’ के तहत रह रही महिला को पति की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेंशन का हक देने का आदेश दिया है। यह फैसला न सिर्फ महिलाओं के अधिकारों को मजबूती देता है, बल्कि परंपरागत सामाजिक व्यवस्थाओं को भी कानूनी संरक्षण प्रदान करता है।

यह मामला 60 वर्षीय राम प्यारी सुमन से जुड़ा है, जिन्होंने अपने दिवंगत पति पूरन लाल सैनी की पारिवारिक पेंशन के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। विभाग ने यह कहते हुए पेंशन देने से इनकार कर दिया था कि सुमन केवल ‘नाता पत्नी’ हैं और उनका नाम आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है।

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अशोक कुमार जैन की एकल पीठ ने 16 जनवरी को इस मामले में सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट द्वारा 2017 में दिया गया आदेश इस बात का ठोस प्रमाण है कि राम प्यारी सुमन मृतक कर्मचारी की वैध पत्नी हैं।

कोर्ट ने कहा कि—

“यदि पति ने न्यायालय में पत्नी के रूप में स्वीकार किया है और भरण-पोषण दिया है, तो ऐसे संबंध को नकारा नहीं जा सकता।”

अदालत ने राजस्थान सिविल सर्विसेज (पेंशन) नियम, 1996 के तहत सुमन को पारिवारिक पेंशन देने का निर्देश दिया।

20 साल पहले हुआ था नाता विवाह

याचिकाकर्ता के वकील तुषार पंवार ने बताया कि पूरन लाल सैनी की पहली पत्नी के निधन के बाद उन्होंने करीब 20 साल पहले राम प्यारी सुमन से ‘नाता विवाह’ किया था। दोनों की एक बेटी भी है। बाद में घरेलू विवाद के चलते सुमन ने भरण-पोषण के लिए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी, जहां सैनी ने पत्नी और बेटी की जिम्मेदारी स्वीकार की थी।

राज्य सरकार की दलील खारिज

राज्य सरकार ने तर्क दिया कि ‘नाता विवाह’ केवल एक सामाजिक समझौता है, कानूनी विवाह नहीं। लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि—

  • पारिवारिक संबंधों की वास्तविकता को नकारा नहीं जा सकता
  • अदालत में की गई स्वीकारोक्ति कानूनी साक्ष्य होती है
  • महिला को पेंशन से वंचित करना अन्याय होगा


वकील बोले— यह न्याय की जीत है

वकील तुषार पंवार ने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि,

“यह निर्णय महिलाओं के अधिकारों की दिशा में मील का पत्थर है। इससे यह स्पष्ट होता है कि विवाह का स्वरूप चाहे जैसा हो, महिला को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।”

उन्होंने कहा कि यह फैसला भविष्य में नाता विवाह से जुड़े मामलों में एक मजबूत कानूनी मिसाल बनेगा।

क्यों है यह फैसला अहम?

✔ नाता विवाह को मिला कानूनी संरक्षण
✔ महिलाओं को पेंशन जैसे अधिकारों में समानता
✔ परंपरागत विवाह प्रणाली को न्यायिक मान्यता
✔ भविष्य के मामलों के लिए मिसाल