जिस बात का डर था, वही हुआ…
नोएडा के दर्दनाक हादसे में जान गंवाने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता को बचाया जा सकता था, लेकिन सिस्टम की सुस्ती, लापरवाही और संसाधनों की कमी ने उसकी जान ले ली। अब इस पूरे मामले में SIT की जांच रिपोर्ट सामने आ चुकी है, जो कई बड़े सवाल खड़े करती है।
600 पन्नों की रिपोर्ट, लेकिन जवाब एक भी नहीं
राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) ने नोएडा अथॉरिटी और पुलिस से विस्तृत जवाब मांगे थे। इसके जवाब में:
सौंपी है।
लेकिन सबसे अहम सवाल — रेस्क्यू में 2 घंटे की देरी क्यों हुई? — इसका कोई ठोस जवाब नहीं दिया गया।
SIT ने कंट्रोल रूम लॉग, कॉल डिटेल्स, ड्यूटी रोस्टर और घटनास्थल की टाइमलाइन की जांच की, जिसमें साफ हुआ कि रेस्क्यू सिस्टम पूरी तरह फेल रहा।
“पापा… मुझे बचा लीजिए” – आखिरी कॉल
16 दिसंबर की रात युवराज मेहता नोएडा के एक निर्माणाधीन बेसमेंट में खुले नाले में गिर गया।
घना कोहरा, अंधेरा और ठंड… लेकिन उससे भी ज्यादा भयावह थी सिस्टम की नाकामी।
युवराज करीब दो घंटे तक मदद के लिए तड़पता रहा, अपने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाकर लोगों को इशारा करता रहा।
उसने अपने पिता से कहा था –
“पापा, मैं नाले में गिर गया हूं… मुझे बचा लीजिए, मैं मरना नहीं चाहता।”
लेकिन मदद समय पर नहीं पहुंची।
चश्मदीद मुनेंद्र का खुलासा
इस हादसे में डिलीवरी बॉय मुनेंद्र ने बहादुरी दिखाते हुए खुद पानी में उतरने की कोशिश की।
उसने SIT को बताया कि:
चौंकाने वाली बात यह है कि जब सामाजिक संगठनों ने मुनेंद्र को सम्मानित करना चाहा, तो कथित तौर पर पुलिस दबाव में कार्यक्रम रद्द कर दिया गया।
80 लोग, फिर भी नहीं बची जान
रिपोर्ट के मुताबिक:
इसके बावजूद युवराज को करीब 4:15 बजे बाहर निकाला गया, तब तक उसकी मौत हो चुकी थी।
प्रशासन पर गिरी गाज
हादसे के बाद सरकार ने बड़ा कदम उठाया है—
✔ नोएडा अथॉरिटी के CEO लोकेश एम को हटाया गया
✔ IAS अधिकारी कृष्ण करुणेश को नया प्रभारी CEO बनाया गया
✔ बिल्डर पर FIR, लुकआउट नोटिस और रेड कॉर्नर नोटिस की तैयारी
निर्माणाधीन साइट के बिल्डर निर्मल सिंह(लोटस ग्रीन) पर लापरवाही के गंभीर आरोप हैं।
पिता का दर्द छलका
युवराज के पिता राजकुमार मेहता ने कहा:
“लोग वीडियो बनाते रहे, मेरा बेटा डूबता रहा।
अगर समय पर गोताखोर आते, तो आज मेरा बेटा जिंदा होता।”
निष्कर्ष
युवराज की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता की जीती-जागती मिसाल है।
600 पन्नों की रिपोर्ट भले आ गई हो, लेकिन सवाल आज भी वही हैं—
रेस्क्यू में देरी क्यों हुई?
जिम्मेदार कौन है?
क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी?
देश अब जवाब चाहता है।