यूपी के शिक्षा मित्रों पर बड़ा आदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार से 2 माह में निर्णय लेने को कहा, नियमितीकरण पर बढ़ी उम्मीद

यूपी के शिक्षा मित्रों पर बड़ा आदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार से 2 माह में निर्णय लेने को कहा, नियमितीकरण पर बढ़ी उम्मीद
March 11, 2026 at 1:12 pm

उत्तर प्रदेश के लाखों शिक्षा मित्रों के लिए बड़ी राहत देने वाली खबर सामने आई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिक्षा मित्रों के नियमितीकरण से जुड़े मामले में राज्य सरकार को महत्वपूर्ण निर्देश जारी करते हुए दो महीने के भीतर निर्णय लेने को कहा है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता शिक्षा मित्र अपनी-अपनी ओर से प्रत्यावेदन दाखिल करें, जिसके बाद सरकार को तय समय सीमा में इस पर विचार कर फैसला लेना होगा। इस आदेश के बाद प्रदेश के करीब डेढ़ लाख शिक्षा मित्रों में फिर से उम्मीद जगी है कि लंबे समय से लंबित नियमितीकरण का मुद्दा अब आगे बढ़ सकता है।


उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत शिक्षा मित्रों के नियमितीकरण को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अहम आदेश जारी किया है। न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान की एकल पीठ ने सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि शिक्षा मित्रों के नियमितीकरण के संबंध में प्राप्त होने वाले प्रत्यावेदनों पर दो महीने के भीतर निर्णय लिया जाए।


अदालत ने अपने आदेश में कहा कि याची तेज बहादुर मौर्य सहित 115 शिक्षा मित्र तीन सप्ताह के भीतर अपर मुख्य सचिव, बेसिक शिक्षा, उत्तर प्रदेश, लखनऊ को अलग-अलग प्रत्यावेदन देंगे। इसके बाद संबंधित अधिकारी इन प्रत्यावेदनों पर विचार करते हुए तय समय सीमा में यह निर्णय लेंगे कि शिक्षा मित्रों को सहायक अध्यापक के पद पर नियमित किया जा सकता है या नहीं।


याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सत्येंद्र चंद्र त्रिपाठी ने अदालत में दलील दी कि शिक्षा मित्र वर्षों से प्राथमिक विद्यालयों में कार्य कर रहे हैं और उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसलिए उनकी लंबी सेवा को देखते हुए उन्हें सहायक अध्यापक के पद पर नियमित किया जाना चाहिए।


अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले पर निर्णय लेते समय सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों और वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाए।


उत्तर प्रदेश में शिक्षा मित्रों की नियुक्ति वर्ष 1999 से शुरू हुई थी। उस समय प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर शिक्षा मित्र रखे गए थे। शुरुआत में इन्हें मानदेय पर रखा गया था और बाद में इन्हें सहायक अध्यापक के पद पर समायोजित करने का प्रयास किया गया।


हालांकि, वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा मित्रों के समायोजन को रद्द कर दिया था और कहा था कि शिक्षक भर्ती नियमों के अनुसार ही नियुक्ति होनी चाहिए। इस फैसले के बाद हजारों शिक्षा मित्र फिर से मानदेय पर आ गए और तब से नियमितीकरण की मांग लगातार उठती रही है।


इसके बाद कई बार राज्य सरकार ने समाधान निकालने की कोशिश की, लेकिन मामला कानूनी पेचीदगियों में उलझा रहा। शिक्षा मित्रों ने कई बार धरना-प्रदर्शन भी किए और अदालतों का दरवाजा खटखटाया।


हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के कुछ आदेशों और शिक्षा मंत्रालय के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए शिक्षा मित्रों ने फिर से नियमितीकरण की मांग उठाई, जिसके बाद यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा।


हाईकोर्ट के इस आदेश का असर प्रदेश के करीब 1.50 लाख शिक्षा मित्रों पर पड़ सकता है। यदि सरकार सकारात्मक निर्णय लेती है तो हजारों परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधर सकती है।


शिक्षा मित्र लंबे समय से कम मानदेय पर काम कर रहे हैं और नियमित शिक्षक के मुकाबले उन्हें कम वेतन और कम सुविधाएं मिलती हैं। नियमितीकरण होने पर उन्हें स्थायी नौकरी, वेतनमान और अन्य सरकारी लाभ मिल सकते हैं।


इसके अलावा इस फैसले का असर शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। प्राथमिक विद्यालयों में पहले से ही शिक्षकों की कमी की शिकायत रहती है। यदि अनुभवी शिक्षा मित्रों को नियमित किया जाता है तो इससे शिक्षा व्यवस्था को स्थिरता मिल सकती है।


हालांकि, यदि सरकार इस पर नीतिगत या कानूनी कारणों से निर्णय नहीं ले पाती, तो मामला फिर से अदालत में जा सकता है।


सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि शिक्षा मित्रों का नियमितीकरण नीतिगत मामला है और इस पर अंतिम निर्णय सरकार को ही लेना है। सरकार के वकील ने यह भी कहा कि इसी प्रकार के मामले में पहले विशेष अपील खारिज की जा चुकी है, इसलिए अदालत को इस विषय में सीधे आदेश नहीं देना चाहिए।


इसके जवाब में याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि परिस्थितियां बदल चुकी हैं और सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देशों तथा केंद्र सरकार के आदेशों के आधार पर शिक्षा मित्रों के मामले पर फिर से विचार किया जा सकता है।


दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने सरकार को निर्णय लेने का निर्देश दिया।


यह आदेश सीधे तौर पर नियमितीकरण का फैसला नहीं है, लेकिन यह शिक्षा मित्रों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी अवसर है। अदालत ने सरकार को फैसला लेने को कहा है, जिससे यह मामला फिर से सक्रिय हो गया है।


राजनीतिक रूप से भी यह मुद्दा संवेदनशील माना जाता है क्योंकि शिक्षा मित्र लंबे समय से आंदोलन करते रहे हैं और यह बड़ा वोट बैंक भी माना जाता है।


सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह ऐसा फैसला करे जो कानूनी रूप से टिकाऊ हो और भविष्य में फिर से अदालत में न फंसे। यदि नियमों में बदलाव किए बिना नियमितीकरण किया जाता है तो फिर से विवाद हो सकता है।


दूसरी ओर, यदि सरकार कोई नया मॉडल लाती है, जैसे विशेष भर्ती या अलग पद, तो यह समझौता समाधान हो सकता है।


इलाहाबाद हाईकोर्ट का ताजा आदेश शिक्षा मित्रों के लिए उम्मीद की नई किरण लेकर आया है। अब नजर राज्य सरकार के फैसले पर टिकी है, जो दो महीने के भीतर लेना होगा। यदि सरकार सकारात्मक निर्णय लेती है तो वर्षों से लंबित मुद्दा सुलझ सकता है, लेकिन यदि मामला फिर टलता है तो शिक्षा मित्रों का संघर्ष जारी रह सकता है।

1. क्या शिक्षामित्र अब नियमित हो जाएंगे?
अभी नियमितीकरण नहीं हुआ है, सरकार को फैसला लेने का आदेश दिया गया है।

2. सरकार को कितना समय मिला है?
हाईकोर्ट ने दो महीने के भीतर निर्णय लेने को कहा है।

3. कितने शिक्षामित्र प्रभावित होंगे?
उत्तर प्रदेश में करीब 1.50 लाख शिक्षा मित्र हैं।

4. क्या सुप्रीमकोर्ट का फैसला भी जुड़ा है?
हाँ, याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया है।

5. अगला कदम क्या होगा?
याची तीन सप्ताह में प्रत्यावेदन देंगे, उसके बाद सरकार निर्णय लेगी।