मध्य पूर्व में जारी ईरान-इजरायल संघर्ष अब और अधिक खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान के वरिष्ठ नेता अली लारिजानी की मौत के बाद जहां दुनिया को उम्मीद थी कि तेहरान का रुख नरम पड़ सकता है, वहीं इसके उलट ईरान ने और आक्रामक रुख अपना लिया है। विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ शब्दों में कहा है कि यह केवल ईरान और इजरायल का युद्ध नहीं, बल्कि अमेरिका की जंग है, जिसे क्षेत्र में फैलाया जा रहा है। इस बीच लगातार हमलों और जवाबी कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है।
ईरान और इजरायल के बीच जारी युद्ध अब 19वें दिन में प्रवेश कर चुका है और हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। ताजा घटनाक्रम में इजरायल ने तेहरान में एक बड़े हवाई हमले को अंजाम दिया, जिसमें ईरान के सुरक्षा प्रमुख अली लारिजानी और बसीज बलों के वरिष्ठ कमांडर गुलारजा सुलेमानी के मारे जाने की खबर सामने आई। यह हमला ईरान के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि दोनों नेता देश की सुरक्षा रणनीति के अहम स्तंभ थे।
हालांकि, इन हमलों के बाद ईरान ने पीछे हटने के बजाय जवाबी कार्रवाई को और तेज कर दिया है। तेहरान ने इजरायल की ओर मल्टी-वॉरहेड बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, जिनमें क्लस्टर बमों का भी इस्तेमाल बताया जा रहा है। ईरान ने इसे अपने नेताओं की मौत का बदला बताया है और चेतावनी दी है कि आगे और भी कड़े कदम उठाए जाएंगे।
इसी दौरान सऊदी अरब में प्रिंस सुल्तान एयरबेस के पास एक बैलिस्टिक मिसाइल को इंटरसेप्ट किया गया, जिससे यह संकेत मिलता है कि युद्ध का दायरा अब खाड़ी देशों तक फैलने लगा है। वहीं दुबई और दोहा में हुए धमाकों ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास पर ड्रोन हमला भी इस संघर्ष के अंतरराष्ट्रीय रूप लेने का संकेत है।
ईरान और इजरायल के बीच तनाव कोई नया नहीं है। पिछले कई दशकों से दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ परोक्ष और प्रत्यक्ष टकराव में शामिल रहे हैं। ईरान जहां इजरायल को अपना प्रमुख दुश्मन मानता है, वहीं इजरायल ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है।
हालिया संघर्ष की शुरुआत तब हुई जब इजरायल ने ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर हमले तेज कर दिए। इसके जवाब में ईरान ने भी अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करते हुए मिसाइल और ड्रोन हमलों की श्रृंखला शुरू कर दी।
इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। अमेरिका इजरायल का प्रमुख सहयोगी है और उसने कई मौकों पर अप्रत्यक्ष समर्थन दिया है, जिससे ईरान का गुस्सा और बढ़ गया है।
इस युद्ध का असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। तेल उत्पादक देशों में अस्थिरता के कारण वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। हालांकि हाल ही में कीमतों में थोड़ी गिरावट दर्ज की गई, लेकिन भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति चिंता का विषय है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आयात करता है। यदि युद्ध और बढ़ता है, तो तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है, जिससे महंगाई पर असर पड़ेगा। इसके अलावा खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा भी एक अहम मुद्दा बन सकता है।
संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत आमिर सईद इरवानी ने कहा है कि अमेरिका और इजरायल के हमलों में 1300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि हमले जानबूझकर नागरिक इलाकों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाकर किए गए हैं।
वहीं विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने स्पष्ट कहा कि “यह केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि अमेरिका द्वारा थोपी गई जंग है।” उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हमले जारी रहे तो ईरान और अधिक कठोर कदम उठाएगा।
मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि यह संघर्ष जल्द समाप्त होने वाला नहीं है। ईरान का सख्त रुख और अमेरिका की अप्रत्यक्ष भागीदारी इस युद्ध को और जटिल बना रही है। यदि नाटो देशों का समर्थन अमेरिका को नहीं मिलता है, तो वह अपने स्तर पर और आक्रामक कदम उठा सकता है।
दूसरी ओर, ईरान के भीतर भी नेतृत्व को लेकर कड़ा रुख अपनाने का दबाव है। लारिजानी जैसे वरिष्ठ नेता की मौत के बाद जनता और सेना दोनों बदले की मांग कर रहे हैं। इससे युद्ध और भी तीव्र हो सकता है।
इसके अलावा, क्षेत्रीय शक्तियों जैसे सऊदी अरब, यूएई और कतर की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि ये देश सीधे तौर पर संघर्ष में शामिल होते हैं, तो यह एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है।
ईरान-इजरायल संघर्ष अब केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक व्यापक भू-राजनीतिक संकट बन चुका है। लारिजानी की मौत के बाद ईरान का और सख्त होना इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह जरूरी है कि वह जल्द से जल्द इस संघर्ष को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए, अन्यथा इसके गंभीर परिणाम पूरी दुनिया को भुगतने पड़ सकते हैं।
1. अली लारिजानी कौन थे?
अली लारिजानी ईरान के वरिष्ठ सुरक्षा नेता और सुप्रीम लीडर के करीबी माने जाते थे।
2. इस युद्ध की शुरुआत कैसे हुई?
इजरायल द्वारा ईरान के ठिकानों पर हमलों के बाद यह संघर्ष तेज हुआ।
3. क्या अमेरिका इस युद्ध में शामिल है?
ईरान का आरोप है कि अमेरिका अप्रत्यक्ष रूप से इस युद्ध में शामिल है।
4. भारत पर इसका क्या असर होगा?
तेल की कीमतों में वृद्धि और खाड़ी देशों में भारतीयों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
5. क्या यह युद्ध बड़े स्तर पर फैल सकता है?
अगर अन्य देश इसमें शामिल होते हैं, तो यह क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है।
ईरान नहीं झुका, लारिजानी की मौत के बाद और सख्त हुआ रुख, अराघची ने अमेरिका को ठहराया जिम्मेदार