इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया क्या होती है? सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद गाजियाबाद केस से उठे कई सवाल

इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया क्या होती है? सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद गाजियाबाद केस से उठे कई सवाल
March 17, 2026 at 2:40 pm

भारत में इच्छा मृत्यु (Euthanasia) को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है, जब सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद गाजियाबाद के हरीश राणा के मामले में निष्क्रिय इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia) की प्रक्रिया शुरू की गई है। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में सक्रिय इच्छा मृत्यु (Active Euthanasia) की अनुमति नहीं है, जबकि कुछ देशों में इसे कानूनी रूप से लागू किया जा चुका है। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया वास्तव में कैसे होती है, क्या इसमें दर्द होता है, और डॉक्टर इसे किस तरह करते हैं।

इस रिपोर्ट में हम निष्क्रिय और सक्रिय इच्छा मृत्यु दोनों की प्रक्रिया, भारत के कानून, मेडिकल प्रोटोकॉल, और इसके सामाजिक-कानूनी प्रभाव को विस्तार से समझेंगे।

गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा वर्ष 2013 से पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट (Persistent Vegetative State) में हैं। डॉक्टरों के अनुसार उनकी स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं बची है। परिवार ने लंबे समय तक इलाज कराने के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसके बाद मार्च 2026 में अदालत ने सख्त शर्तों के साथ निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की अनुमति दी।

अदालत के आदेश के बाद दिल्ली एम्स के पेलिएटिव केयर विभाग को प्रक्रिया की जिम्मेदारी दी गई है। डॉक्टरों के एक विशेष मेडिकल बोर्ड ने मरीज की हालत की समीक्षा की और यह सुनिश्चित किया कि रिकवरी की कोई संभावना नहीं है। इसके बाद जीवन रक्षक उपकरणों को चरणबद्ध तरीके से हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई।

निष्क्रिय इच्छा मृत्यु में मरीज को कोई घातक दवा नहीं दी जाती, बल्कि जो कृत्रिम सहारा शरीर को जीवित रख रहा होता है, उसे धीरे-धीरे हटाया जाता है। इसमें फीडिंग ट्यूब, ऑक्सीजन सपोर्ट, वेंटिलेटर या अन्य लाइफ सपोर्ट सिस्टम शामिल हो सकते हैं। इस दौरान डॉक्टर दर्द निवारक और शांतिदायक दवाएं देते हैं ताकि मरीज को किसी प्रकार की पीड़ा महसूस न हो।

डॉक्टरों के अनुसार यह प्रक्रिया कुछ घंटों से लेकर कई दिनों तक चल सकती है और पूरी तरह मेडिकल निगरानी में होती है।

इच्छा मृत्यु को दो प्रकार में बांटा जाता है —

  1. निष्क्रिय इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia)
  2. सक्रिय इच्छा मृत्यु (Active Euthanasia)

भारत में केवल निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी है।

साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने “लिविंग विल” को मान्यता दी थी, जिसमें व्यक्ति पहले से लिखकर दे सकता है कि गंभीर बीमारी की स्थिति में उसे लाइफ सपोर्ट पर न रखा जाए। इसके बाद 2023 और 2024 में कोर्ट ने प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए।

सक्रिय इच्छा मृत्यु, जिसमें डॉक्टर इंजेक्शन देकर जीवन समाप्त करते हैं, भारत में अवैध है। लेकिन नीदरलैंड, बेल्जियम, कनाडा, स्विट्जरलैंड और कुछ अन्य देशों में सख्त नियमों के साथ इसकी अनुमति है।

हरीश राणा का मामला भारत में इच्छा मृत्यु से जुड़े कानून और मेडिकल सिस्टम पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।

  • कई परिवार, जिनके मरीज वर्षों से कोमा या गंभीर अवस्था में हैं, अब कानूनी विकल्पों के बारे में जानकारी ले रहे हैं।
  • अस्पतालों में पेलिएटिव केयर की भूमिका बढ़ने की संभावना है।
  • डॉक्टरों के लिए भी यह एक संवेदनशील जिम्मेदारी होती है, क्योंकि हर फैसला मेडिकल और कानूनी जांच के बाद ही लिया जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसे देश में इच्छा मृत्यु का मुद्दा केवल मेडिकल नहीं, बल्कि सामाजिक, धार्मिक और नैतिक सवालों से भी जुड़ा हुआ है।

एम्स से जुड़े एक वरिष्ठ डॉक्टर ने मीडिया से बातचीत में कहा कि
“निष्क्रिय इच्छा मृत्यु का उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं होता, बल्कि उस स्थिति में अनावश्यक कृत्रिम उपचार को रोकना होता है जब मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं होती। इस दौरान मरीज को दर्द से बचाने के लिए पूरी पेलिएटिव केयर दी जाती है।”

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि
“सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार मेडिकल बोर्ड, परिवार की सहमति और प्रशासनिक अनुमति के बिना यह प्रक्रिया नहीं की जा सकती।”

इच्छा मृत्यु पर बहस दुनिया भर में जारी है। कुछ लोग इसे मानवीय अधिकार मानते हैं, जबकि कुछ इसे नैतिक रूप से गलत बताते हैं।

सक्रिय इच्छा मृत्यु के समर्थकों का तर्क है कि असहनीय दर्द से गुजर रहे व्यक्ति को सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार होना चाहिए।
विरोध करने वालों का कहना है कि इससे गलत इस्तेमाल का खतरा बढ़ सकता है।

भारत ने बीच का रास्ता चुना है —
यहां केवल निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की अनुमति है, जिसमें प्राकृतिक मृत्यु की प्रक्रिया को रोका नहीं जाता, लेकिन कृत्रिम रूप से जीवन बढ़ाने की कोशिश भी नहीं की जाती।

विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में भारत में इस विषय पर और स्पष्ट कानून बन सकते हैं, क्योंकि मेडिकल टेक्नोलॉजी के कारण मरीज को लंबे समय तक जीवित रखना संभव हो गया है।

गाजियाबाद का मामला केवल एक परिवार की पीड़ा की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत के कानून, चिकित्सा व्यवस्था और समाज के सामने खड़े कठिन सवालों को भी दिखाता है।

निष्क्रिय इच्छा मृत्यु का उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं, बल्कि ऐसी स्थिति में सम्मानजनक मृत्यु सुनिश्चित करना है जब जीवन बचाने की कोई संभावना नहीं होती।

सुप्रीम कोर्ट के सख्त नियमों के कारण यह प्रक्रिया बेहद नियंत्रित और पारदर्शी तरीके से की जाती है, ताकि इसका गलत उपयोग न हो और मरीज की गरिमा बनी रहे।

1. इच्छा मृत्यु क्या होती है?
इच्छा मृत्यु वह प्रक्रिया है जिसमें असाध्य बीमारी या कोमा की स्थिति में जीवन रक्षक उपचार रोक दिया जाता है या कुछ देशों में दवा देकर मृत्यु दी जाती है।

2. क्या भारत में इच्छा मृत्यु कानूनी है?
भारत में केवल निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की अनुमति है, सक्रिय इच्छा मृत्यु अवैध है।

3. निष्क्रिय इच्छा मृत्यु में क्या किया जाता है?
लाइफ सपोर्ट सिस्टम धीरे-धीरे हटाया जाता है और मरीज को आराम देने वाली दवाएं दी जाती हैं।

4. क्या इस में दर्द होता है?
डॉक्टर दर्द कम करने के लिए दवाएं देते हैं, इसलिए सामान्यतः मरीज को पीड़ा नहीं होती।

5. क्या हर कोई इच्छा मृत्यु ले सकता है?
नहीं, इसके लिए मेडिकल बोर्ड, परिवार की सहमति और कानूनी अनुमति जरूरी होती है।