दिल्ली शराब नीति केस: केजरीवाल-सिसोदिया ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, हाईकोर्ट की बेंच पर उठाए सवाल

दिल्ली शराब नीति केस: केजरीवाल-सिसोदिया ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, हाईकोर्ट की बेंच पर उठाए सवाल
March 16, 2026 at 4:06 pm

दिल्ली की कथित आबकारी नीति (Excise Policy) मामले में कानूनी लड़ाई एक बार फिर तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने दिल्ली हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई से पहले सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। दोनों नेताओं ने हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई कर रही बेंच की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए सुनवाई किसी अन्य पीठ के समक्ष कराने की मांग की है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब निचली अदालत पहले ही इस मामले में आरोपियों को राहत दे चुकी है, लेकिन जांच एजेंसी सीबीआई ने उस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है।


दिल्ली की नई शराब नीति से जुड़े कथित घोटाले के मामले में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दिल्ली हाईकोर्ट में चल रही कार्यवाही पर रोक लगाने और मामले की सुनवाई किसी दूसरी बेंच को सौंपने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि सुनवाई कर रहे न्यायाधीश की कुछ प्रारंभिक टिप्पणियों से यह आशंका पैदा होती है कि मामले की निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है।


याचिका के अनुसार, हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों से ऐसा प्रतीत हुआ कि ट्रायल कोर्ट के फैसले को पहले ही गलत मान लिया गया है, जबकि मामले की पूरी दलीलें अभी सुनी भी नहीं गई थीं। केजरीवाल की ओर से दायर अर्जी में कहा गया कि न्याय का सिद्धांत केवल निष्पक्ष होना ही नहीं बल्कि निष्पक्ष दिखाई देना भी जरूरी है। इसलिए मामले को किसी अन्य पीठ के समक्ष भेजना न्यायहित में होगा।


दूसरी ओर मनीष सिसोदिया ने हाईकोर्ट द्वारा जारी समन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उनका कहना है कि जब ट्रायल कोर्ट ने उन्हें पर्याप्त सबूतों के अभाव में डिस्चार्ज कर दिया था, तो बिना पूरी सुनवाई के हाईकोर्ट में प्रारंभिक टिप्पणियां करना उचित नहीं है।


यह मामला 16 मार्च को दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था, लेकिन उससे पहले सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के कारण कानूनी स्थिति और जटिल हो गई है।


दिल्ली सरकार की 2021-22 की आबकारी नीति को लेकर कथित अनियमितताओं का मामला पिछले दो वर्षों से देश की राजनीति के केंद्र में बना हुआ है। जांच एजेंसियों का आरोप है कि नई नीति बनाते समय कुछ निजी कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया और लाइसेंस देने की प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन हुआ।


सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय ने इस मामले में कई नेताओं और कारोबारियों के खिलाफ केस दर्ज किया था। जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की गई, लेकिन 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट ने सबूतों को अपर्याप्त बताते हुए अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया सहित कई आरोपियों को राहत दे दी।


निचली अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि जांच एजेंसी की चार्जशीट में कई कमियां हैं और आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। इसके बाद सीबीआई ने इस फैसले को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।


इस मामले का असर केवल दिल्ली की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर भी देखा जा रहा है। आम आदमी पार्टी इस केस को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बता रही है, जबकि विपक्षी दल इसे भ्रष्टाचार से जुड़ा गंभीर मामला मानते हैं।


यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सुनवाई रोकता है या बेंच बदलने का आदेश देता है, तो इससे देशभर में न्यायिक प्रक्रिया और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर बहस तेज हो सकती है।


राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस केस का असर आगामी चुनावों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि यह मुद्दा लगातार जनता के बीच चर्चा में बना हुआ है।


अरविंद केजरीवाल की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि उनकी मांग किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए है। याचिका में यह भी कहा गया कि न्यायपालिका पर जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि किसी भी प्रकार की पक्षपात की आशंका को दूर किया जाए।


मनीष सिसोदिया की ओर से भी सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश को बिना पूरी सुनवाई के गलत ठहराना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।


सीबीआई की ओर से अभी तक इस नई याचिका पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन एजेंसी पहले ही कह चुकी है कि उसके पास मामले से जुड़े पर्याप्त साक्ष्य हैं और वह उच्च अदालत में अपना पक्ष मजबूती से रखेगी।


कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी मामले में बेंच बदलने की मांग बहुत गंभीर मानी जाती है और सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों में तभी हस्तक्षेप करता है जब निष्पक्षता पर ठोस आधार पर सवाल उठे हों।


यह भी संभव है कि सुप्रीम कोर्ट पहले हाईकोर्ट को ही मामले पर फैसला लेने दे और सीधे हस्तक्षेप से बचे। हालांकि, यदि अदालत को लगे कि न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, तो वह सुनवाई रोकने या बेंच बदलने का आदेश दे सकती है।


राजनीतिक दृष्टि से यह मामला आम आदमी पार्टी और केंद्र सरकार के बीच लंबे समय से चल रहे टकराव का हिस्सा भी माना जा रहा है। ऐसे मामलों में अदालतों के फैसले का असर केवल कानून तक सीमित नहीं रहता बल्कि जनता की धारणा पर भी पड़ता है।


दिल्ली शराब नीति मामला एक बार फिर नए मोड़ पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट में केजरीवाल और सिसोदिया की याचिका से यह स्पष्ट है कि यह कानूनी लड़ाई अभी लंबी चल सकती है। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट का फैसला तय करेगा कि हाईकोर्ट में सुनवाई कैसे आगे बढ़ेगी और इस मामले की दिशा क्या होगी।


देश की राजनीति और न्यायिक व्यवस्था दोनों के लिए यह मामला महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसमें जांच एजेंसियों की भूमिका, अदालतों की प्रक्रिया और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप सब एक साथ जुड़े हुए हैं।


1. दिल्ली शराब नीति मामला क्या है?
यह मामला दिल्ली सरकार की 2021-22 की आबकारी नीति में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है, जिसकी जांच सीबीआई और ईडी कर रही हैं।


2. केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट क्यों गए?
उन्होंने हाईकोर्ट की बेंच पर निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाते हुए सुनवाई किसी अन्य पीठ से कराने की मांग की है।


3. मनीष सिसोदिया ने क्या चुनौती दी है?
उन्होंने हाईकोर्ट द्वारा जारी समन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।


4. ट्रायल कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
ट्रायल कोर्ट ने सबूतों की कमी बताते हुए कई आरोपियों को राहत दी थी।


5. आगे क्या हो सकता है?
सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि हाईकोर्ट में सुनवाई जारी रहेगी या बेंच बदली जाएगी।