यूपी में गैरहाजिर डॉक्टर पर 1 करोड़ का जुर्माना, स्वास्थ्य विभाग की सख्ती से मचा हड़कंप

यूपी में गैरहाजिर डॉक्टर पर 1 करोड़ का जुर्माना, स्वास्थ्य विभाग की सख्ती से मचा हड़कंप
April 14, 2026 at 2:01 pm

उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग ने एक कड़ा कदम उठाते हुए सेवा से गैरहाजिर रहने वाले एक चिकित्साधिकारी पर एक करोड़ रुपये का जुर्माना लगाने का आदेश जारी किया है। अमरोहा निवासी डॉ. पीतम सिंह पर यह कार्रवाई नीट पीजी पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद सरकारी सेवा में योगदान न देने के कारण की गई है। इस फैसले के बाद स्वास्थ्य महकमे में हलचल तेज हो गई है और यह मामला प्रदेश के डॉक्टरों के लिए एक सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

मामला अमरोहा जिले के रहने वाले चिकित्साधिकारी डॉ. पीतम सिंह से जुड़ा है, जिन्होंने वर्ष 2010 में चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में अपनी सेवाएं शुरू की थीं। उनकी पहली तैनाती रायबरेली जिले के ऊंचाहार स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में हुई थी। सेवा के दौरान उन्होंने वर्ष 2017 में नीट पीजी के माध्यम से स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए आवेदन किया था।

पीजी पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए विभागीय नियमों के तहत उन्होंने एक करोड़ रुपये का बांड भरा था। इसके बाद उन्हें लखनऊ स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में एमडी (माइक्रोबायोलॉजी) में अध्ययन के लिए अनुमति दी गई। विभाग ने उन्हें अनापत्ति प्रमाण पत्र भी जारी किया था, जिससे वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें।

पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद वर्ष 2020 में उन्होंने विभाग को योगदान रिपोर्ट सौंपी। इसके बाद उनका स्थानांतरण गाजियाबाद के एमएमजी जिला अस्पताल में कर दिया गया। हालांकि, जांच में सामने आया कि उन्होंने अपनी नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण नहीं किया और लंबे समय से ड्यूटी से गैरहाजिर चल रहे हैं।

इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की महानिदेशक (प्रशिक्षण) डॉ. रंजना खरे ने सख्त रुख अपनाया। उन्होंने आदेश जारी कर डॉ. पीतम सिंह से बांड के अनुसार एक करोड़ रुपये की राशि सरकारी कोष में जमा कराने के निर्देश दिए।

उत्तर प्रदेश में डॉक्टरों की कमी विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रही है। इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने ऐसे चिकित्साधिकारियों को प्रोत्साहन देने के लिए विशेष व्यवस्था बनाई है, जो कठिन क्षेत्रों में सेवा देते हैं।

एमसीआई रेगुलेशन-2000 के तहत ऐसे डॉक्टरों को नीट पीजी में वेटेज (अतिरिक्त अंक) दिया जाता है। इसके बदले उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे स्नातकोत्तर शिक्षा पूरी करने के बाद कम से कम 10 वर्षों तक सरकारी सेवा में योगदान देंगे। इसी शर्त को सुनिश्चित करने के लिए उनसे एक करोड़ रुपये का बांड लिया जाता है।

इस कार्रवाई का सीधा प्रभाव प्रदेश के अन्य चिकित्साधिकारियों पर पड़ने की संभावना है। यह निर्णय यह स्पष्ट करता है कि सरकार अब नियमों के उल्लंघन को लेकर किसी भी प्रकार की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की सख्ती से ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता में सुधार हो सकता है। साथ ही यह उन उम्मीदवारों के लिए भी चेतावनी है जो सरकारी सुविधाओं का लाभ लेकर बाद में सेवा से दूर हो जाते हैं।

हालांकि, कुछ चिकित्सक संगठनों का मानना है कि सरकार को सख्ती के साथ-साथ कार्य परिस्थितियों में सुधार पर भी ध्यान देना चाहिए, ताकि डॉक्टर स्वेच्छा से सेवा देने के लिए प्रेरित हों।

प्रभारी मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. योगेंद्र सिंह ने बताया कि महानिदेशक (प्रशिक्षण) द्वारा जारी आदेश प्राप्त हो चुका है। उन्होंने कहा कि संबंधित चिकित्साधिकारी जिले के निवासी हैं, लेकिन उनकी तैनाती अन्य जनपदों में रही है। शासन के निर्देशानुसार उनसे बांड की राशि वसूलने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

यह मामला केवल एक व्यक्ति पर की गई कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। सरकारी संसाधनों से उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले डॉक्टरों से सेवा की अपेक्षा करना एक उचित नीति है, क्योंकि इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत होती है।

लेकिन यह भी जरूरी है कि सरकार डॉक्टरों के लिए बेहतर कार्य वातावरण, पर्याप्त संसाधन और सुरक्षा सुनिश्चित करे। यदि दोनों पहलुओं पर संतुलन बनाया जाए, तो न केवल नियमों का पालन बेहतर होगा, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता भी सुधरेगी।

यह निर्णय नीति के कड़ाई से पालन का उदाहरण है, लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी उठता है कि क्या केवल दंडात्मक कार्रवाई से समस्या का समाधान संभव है या फिर संरचनात्मक सुधार भी आवश्यक हैं।

डॉ. पीतम सिंह पर लगाया गया एक करोड़ रुपये का जुर्माना उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग की सख्त नीति का प्रतीक है। यह कदम स्पष्ट करता है कि अब अनुबंध के उल्लंघन को गंभीरता से लिया जाएगा। आने वाले समय में इस फैसले का व्यापक असर देखने को मिल सकता है, जिससे सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में अनुशासन और जिम्मेदारी दोनों बढ़ने की उम्मीद है।

1. डॉक्टर पर एक करोड़ रुपये का जुर्माना क्यों लगाया गया?
नीट पीजी के बाद निर्धारित सेवा अवधि पूरी न करने और ड्यूटी से गैरहाजिर रहने के कारण यह जुर्माना लगाया गया।

2. क्या यह नियम सभी डॉक्टरों पर लागू होता है?
हां, जो डॉक्टर सरकारी सेवा के तहत पीजी करते हैं और बांड भरते हैं, उन पर यह नियम लागू होता है।

3. बांड की राशि कितनी होती है?
उत्तर प्रदेश में यह राशि आमतौर पर एक करोड़ रुपये निर्धारित है।

4. इस फैसले का क्या असर होगा?
इससे अन्य डॉक्टरों में अनुशासन बढ़ेगा और सरकारी सेवा में योगदान सुनिश्चित हो सकता है।

5. क्या डॉक्टर इस आदेश को चुनौती दे सकते हैं?
हां, वे कानूनी रूप से इस आदेश को अदालत में चुनौती दे सकते हैं।