मध्य पूर्व में एक बार फिर युद्ध के बादल गहराते नजर आ रहे हैं। अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य दबाव तेज कर दिया है और क्षेत्र में अपने युद्धपोतों की तैनाती बढ़ा दी है। अमेरिकी नौसेना का अत्याधुनिक एयरक्राफ्ट कैरियर USS Abraham Lincoln कई युद्धपोतों के साथ पश्चिम एशिया पहुंच चुका है, जिससे हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं।
अमेरिकी तैयारी से बढ़ा तनाव
अमेरिकी रक्षा सूत्रों के मुताबिक, बीते कुछ दिनों में अमेरिका ने रणनीतिक रूप से अपनी सैन्य मौजूदगी मजबूत की है। रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि अमेरिका ने ईरान में संभावित हमलों के लिए कई अहम ठिकानों की पहचान कर ली है। हालांकि, अमेरिकी सेंट्रल कमांड का कहना है कि यह तैनाती सिर्फ सुरक्षा कारणों से की गई है।
लेकिन पश्चिमी मीडिया के अनुसार, यह सिर्फ सतही बयान है। अंदरखाने तैयारियां कहीं अधिक गंभीर बताई जा रही हैं।
खामेनेई पर बढ़ा दबाव
ईरान के भीतर भी हालात अस्थिर बताए जा रहे हैं। खबर है कि देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को सुरक्षा कारणों से बंकर में शिफ्ट कर दिया गया है और कई अहम फैसलों की जिम्मेदारी उनके बेटे संभाल रहे हैं।
अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का मानना है कि 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद यह पहला मौका है जब ईरान की सरकार इतनी कमजोर स्थिति में है। आर्थिक संकट, आंतरिक असंतोष और अंतरराष्ट्रीय दबाव ने तेहरान की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
क्यों चुना गया यही वक्त?
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी एजेंसियों का आकलन है कि ईरान इस समय राजनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद कमजोर है। विरोध प्रदर्शन भले ही थमे हों, लेकिन सरकार की पकड़ ढीली पड़ी है।
इसी इनपुट के आधार पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को हालात से अवगत कराया गया है और उन्हें संभावित सैन्य कार्रवाई के विकल्प सौंपे गए हैं।
यूएई ने झाड़ा पल्ला
इस बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने बड़ा बयान देते हुए साफ कर दिया है कि वह ईरान पर किसी भी अमेरिकी हमले में शामिल नहीं होगा।
यूएई के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि:
यह बयान उस वक्त आया जब अमेरिका ने खाड़ी क्षेत्र में अपने युद्धपोतों की मौजूदगी बढ़ाई है।
ईरान की चेतावनी
ईरान ने भी अमेरिका को दो टूक चेतावनी दी है। एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने कहा कि:
“अगर ईरान पर हमला हुआ, चाहे वह सीमित ही क्यों न हो, तो उसे पूर्ण युद्ध माना जाएगा और जवाब बेहद कठोर होगा।”
ईरानी सेना को हाई अलर्ट पर रखा गया है। पिछले साल भी अमेरिका ने इसी तरह सैन्य जमावड़ा किया था, जिसके बाद ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले हुए थे।
निष्कर्ष
मिडिल ईस्ट एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर खड़ा दिखाई दे रहा है। अमेरिका की सैन्य गतिविधियां, ईरान की चेतावनियां और खाड़ी देशों की सतर्कता — सब मिलकर आने वाले दिनों को बेहद संवेदनशील बना रहे हैं। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या यह तनाव सिर्फ दबाव की रणनीति है या फिर वाकई एक बड़े संघर्ष की शुरुआत।