मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच दुनिया भर के सैन्य विशेषज्ञ जिस शब्द की सबसे ज्यादा चर्चा कर रहे हैं, वह है ईरान की “मोजैक रणनीति”। अमेरिका और इजरायल को उम्मीद थी कि शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाकर ईरान की सैन्य क्षमता को जल्दी खत्म किया जा सकेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके उलट ईरान की सेना अलग-अलग हिस्सों में बंटी होने के कारण लगातार जवाबी कार्रवाई कर रही है। यही वजह है कि संघर्ष लंबा खिंचता जा रहा है और हालात पहले से ज्यादा जटिल हो गए हैं।
इस रणनीति को समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि तेल बाजार, वैश्विक राजनीति और भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
ईरान की जिस रणनीति की चर्चा हो रही है, उसे “मोजैक डिफेंस स्ट्रक्चर” कहा जाता है। यह एक ऐसा सैन्य ढांचा है जिसमें पूरी सेना एक ही केंद्रीय कमांड से नहीं चलती, बल्कि कई स्वतंत्र कमांड इकाइयों में बंटी होती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान ने अपनी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को कई प्रांतीय कमांड में बांट दिया है। हर प्रांत की अपनी अलग यूनिट, अलग कमांडर, अलग हथियार और अलग इंटेलिजेंस सिस्टम है।
इसका मतलब यह है कि अगर किसी एक कमांड को नुकसान पहुंचता है, तो बाकी यूनिट बिना प्रभावित हुए लड़ाई जारी रख सकती हैं। यही कारण है कि शीर्ष नेताओं या बड़े सैन्य ठिकानों पर हमले के बावजूद ईरान की सैन्य प्रतिक्रिया बंद नहीं होती।
रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान में 30 से अधिक प्रांतीय कमांड बनाए गए हैं, जिनके पास स्थानीय स्तर पर कार्रवाई करने की पूरी स्वतंत्रता है। राजधानी तेहरान में अलग से अतिरिक्त कमांड रखी गई हैं ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत जवाब दिया जा सके।
यह संरचना पारंपरिक सेना मॉडल से बिल्कुल अलग है, जहां आदेश केवल शीर्ष नेतृत्व से आते हैं।
इस रणनीति की जड़ें 2003 के इराक युद्ध से जुड़ी मानी जाती हैं। उस समय अमेरिका ने सद्दाम हुसैन की सरकार को गिराने के लिए तेज हमला किया था।
इराक की सेना पूरी तरह केंद्रीय कमांड पर निर्भर थी। जैसे ही शीर्ष नेतृत्व खत्म हुआ, पूरी व्यवस्था ढह गई।
ईरान ने उसी समय यह समझ लिया था कि यदि उसके साथ भी ऐसा हमला हुआ तो पारंपरिक सेना ढांचा कमजोर साबित हो सकता है।
इसके बाद IRGC के वरिष्ठ कमांडर मोहम्मद जाफरी ने सेना का ढांचा बदलने का प्रस्ताव दिया।
2005 के बाद से धीरे-धीरे ईरान ने अपनी सेना को “मोजैक मॉडल” में बदलना शुरू किया।
इस मॉडल में
इसी वजह से किसी एक जगह हमला होने पर पूरी सेना कमजोर नहीं होती।
ईरान की यह रणनीति केवल युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक स्तर पर दिख सकता है।
सबसे बड़ा असर तेल बाजार पर पड़ता है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है।
अगर संघर्ष बढ़ता है तो तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं।
भारत जैसे देशों के लिए यह बड़ी चिंता है क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात करता है।
इसके अलावा
जैसे परिणाम सामने आ सकते हैं।
यही कारण है कि भारत लगातार शांति की अपील करता रहा है।
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि ईरान की रणनीति “लंबी लड़ाई” के लिए बनाई गई है।
कई रक्षा विशेषज्ञों ने कहा है कि
ईरान सीधे टकराव के बजाय बहु-स्तरीय दबाव बनाता है।
इसमें
जैसे तरीके शामिल हो सकते हैं।
अमेरिकी अधिकारियों ने भी माना है कि ईरान का सैन्य ढांचा पारंपरिक नहीं है, इसलिए उसे पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं है।
मोजैक रणनीति का असली मकसद है युद्ध को छोटा नहीं बल्कि लंबा बनाना।
अगर युद्ध लंबा चलता है तो
ईरान इसी सिद्धांत पर काम करता दिखता है।
इसके अलावा ईरान केवल अपनी सेना पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि क्षेत्रीय सहयोगियों के जरिए भी दबाव बनाता है।
इसी वजह से संघर्ष कई मोर्चों पर फैल जाता है और विरोधी देश को ज्यादा संसाधन खर्च करने पड़ते हैं।
यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे “मकड़जाल जैसी रणनीति” भी कहते हैं।
ईरान की मोजैक रणनीति आधुनिक युद्ध की बदलती तस्वीर को दिखाती है।
अब केवल बड़ी सेना होना ही जीत की गारंटी नहीं है, बल्कि लचीला और बहु-स्तरीय ढांचा ज्यादा असरदार साबित हो सकता है।
अमेरिका और इजरायल के लिए चुनौती यही है कि वे एक ऐसे सिस्टम से मुकाबला कर रहे हैं जो एक केंद्र पर निर्भर नहीं है।
इस संघर्ष का असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया, खासकर ऊर्जा बाजार और एशियाई देशों पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।
इसलिए आने वाले समय में यह रणनीति अंतरराष्ट्रीय सैन्य अध्ययन का बड़ा विषय बन सकती है।
1. मोजैक रणनीति क्या है?
यह ऐसा सैन्य ढांचा है जिसमें सेना कई स्वतंत्र कमांड में बंटी होती है।
2. ईरान ने यह रणनीति कब बनाई?
2003 के इराक युद्ध के बाद इस पर काम शुरू हुआ।
3. इसका फायदा क्या है?
एक यूनिट खत्म होने पर बाकी सेना लड़ती रहती है।
4. इसका असर भारत पर क्यों पड़ सकता है?
तेल कीमत, व्यापार और खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीय प्रभावित हो सकते हैं।
5. क्या इससे युद्धलंबाहोसकता है?
हाँ, यह रणनीति लंबे संघर्ष के लिए बनाई गई मानी जाती है।
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