उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले से गैस सिलेंडर की कालाबाजारी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने एलपीजी वितरण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासन की संयुक्त टीम द्वारा की गई छापेमारी में सामने आया कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज सैकड़ों भरे सिलेंडर गोदाम में मौजूद ही नहीं थे। इतना ही नहीं, ग्राहकों से ई-केवाईसी के नाम पर पैसे वसूलने और बिना बुकिंग सिलेंडर बेचने के आरोप भी सामने आए हैं। इस कार्रवाई के बाद संबंधित गैस एजेंसी को सील कर दिया गया है और पूरे मामले की जांच शुरू कर दी गई है।
जानकारी के अनुसार, सिधौली तहसील के कसमंडा ब्लॉक स्थित आरके इंडियन गैस वितरक एजेंसी के खिलाफ लंबे समय से शिकायतें मिल रही थीं। उपभोक्ताओं का आरोप था कि उन्हें समय पर गैस सिलेंडर नहीं मिल रहा, जबकि एजेंसी के कर्मचारी अतिरिक्त पैसे मांग रहे हैं। शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए एसडीएम और जिला पूर्ति अधिकारी (DSO) की संयुक्त टीम ने एजेंसी पर छापा मारा।
जांच के दौरान सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ जब रिकॉर्ड में दर्ज सिलेंडरों और गोदाम में मौजूद सिलेंडरों की संख्या में भारी अंतर पाया गया। अधिकारियों के अनुसार 11 मार्च को एजेंसी को 342 भरे हुए एलपीजी सिलेंडर मिले थे, लेकिन गोदाम में सिर्फ 4 भरे सिलेंडर ही पाए गए। वहीं सैकड़ों खाली सिलेंडर मौजूद थे, जिससे आशंका जताई गई कि भरे सिलेंडर बिना बुकिंग और बिना डिलीवरी ऑथेंटिकेशन कोड (DAC) के बाजार में बेच दिए गए।
जांच में यह भी सामने आया कि कई उपभोक्ताओं को बिना ऑनलाइन बुकिंग के सिलेंडर देने का लालच दिया जाता था और इसके बदले अतिरिक्त पैसे लिए जाते थे। यह नियमों का सीधा उल्लंघन माना जा रहा है और इसे कालाबाजारी की श्रेणी में रखा गया है।
ग्रामीण उपभोक्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि ई-केवाईसी की प्रक्रिया, जो कि सरकार द्वारा मुफ्त कराई जाती है, उसके नाम पर एजेंसी कर्मचारी 150 से 180 रुपये तक वसूल रहे थे। जो लोग पैसे देने से मना करते थे, उन्हें सिलेंडर देने में देरी की जाती थी या बार-बार वापस भेज दिया जाता था।
देश में एलपीजी सिलेंडर की आपूर्ति पहले से ही संवेदनशील मुद्दा बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे तनाव, खासकर मध्य-पूर्व क्षेत्र में जारी संघर्ष के कारण तेल और गैस की सप्लाई पर असर पड़ने की आशंका बनी रहती है। ऐसे समय में यदि स्थानीय स्तर पर ही कालाबाजारी या गड़बड़ी होती है, तो इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
सरकार ने एलपीजी वितरण प्रणाली को पारदर्शी बनाने के लिए ऑनलाइन बुकिंग, ओटीपी आधारित डिलीवरी और ई-केवाईसी जैसी व्यवस्थाएं लागू की हैं, ताकि कोई भी एजेंसी नियमों से बाहर जाकर सिलेंडर न बेच सके। इसके बावजूद कई जगहों से अनियमितताओं की शिकायतें आती रहती हैं।
सीतापुर का मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि यहां एजेंसी के पास करीब 14 हजार गैस कनेक्शन दर्ज थे, जबकि गोदाम की क्षमता केवल 8 हजार सिलेंडरों की बताई गई। नियमों के अनुसार गोदाम की क्षमता और कनेक्शन की संख्या के बीच संतुलन होना जरूरी होता है।
इस तरह की गड़बड़ी का सबसे बड़ा असर आम लोगों पर पड़ता है। जब सिलेंडर की कालाबाजारी होती है, तो उपभोक्ताओं को समय पर गैस नहीं मिलती और उन्हें बाजार से महंगे दाम पर सिलेंडर खरीदना पड़ता है। ग्रामीण इलाकों में इसका असर और ज्यादा होता है, क्योंकि वहां वैकल्पिक ईंधन के साधन सीमित होते हैं।
यदि इस तरह की घटनाएं बढ़ती हैं, तो पूरे वितरण तंत्र पर लोगों का भरोसा कमजोर हो सकता है। सरकार की योजनाओं का फायदा सही लोगों तक नहीं पहुंच पाता और जरूरतमंद उपभोक्ता परेशान होते हैं।
जिला पूर्ति अधिकारी ने कार्रवाई के बाद बताया कि एजेंसी के खिलाफ लगातार शिकायतें मिल रही थीं, जिसके बाद जांच की गई। जांच में कई अनियमितताएं सामने आई हैं, जिनमें बिना बुकिंग सिलेंडर देना, रिकॉर्ड में हेरफेर और ई-केवाईसी के नाम पर वसूली शामिल है। फिलहाल एजेंसी को सील कर दिया गया है और मामले की विस्तृत जांच चल रही है।
एसडीएम ने कहा कि किसी भी उपभोक्ता से ई-केवाईसी के नाम पर पैसा लेना पूरी तरह गलत है। यदि कोई एजेंसी ऐसा करती है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
यह मामला सिर्फ एक गैस एजेंसी तक सीमित नहीं माना जा सकता। विशेषज्ञों का कहना है कि एलपीजी वितरण प्रणाली में डिजिटल व्यवस्था होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर निगरानी कमजोर होने से इस तरह की गड़बड़ी संभव हो जाती है।
अक्सर देखा जाता है कि जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैस या तेल की सप्लाई को लेकर चिंता होती है, तो बाजार में कालाबाजारी की घटनाएं बढ़ जाती हैं। ऐसे समय में कुछ लोग आपूर्ति संकट का फायदा उठाकर ज्यादा मुनाफा कमाने की कोशिश करते हैं।
इस मामले ने यह भी दिखाया है कि उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों की जानकारी होना जरूरी है। ई-केवाईसी, बुकिंग और डिलीवरी से जुड़े नियमों को समझने से लोग ठगी से बच सकते हैं।
सीतापुर की घटना ने साफ कर दिया है कि एलपीजी वितरण व्यवस्था में सख्त निगरानी की जरूरत है। सरकार ने भले ही पारदर्शी सिस्टम लागू किया हो, लेकिन यदि स्थानीय स्तर पर नियमों का पालन न हो तो आम लोगों को परेशानी झेलनी पड़ती है। प्रशासन की कार्रवाई से फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन जरूरी है कि पूरे प्रदेश में ऐसी एजेंसियों की जांच की जाए, ताकि उपभोक्ताओं का भरोसा बना रहे।
1. क्या ई-केवाई सी के लिए पैसे देना जरूरी है?
नहीं, ई-केवाईसी प्रक्रिया पूरी तरह मुफ्त होती है। पैसे मांगना गलत है।
2. बिना बुकिंग सिलेंडर लेना क्या नियम के खिलाफ है?
हां, हर सिलेंडर की ऑनलाइन बुकिंग और ओटीपी से डिलीवरी जरूरी है।
3. शिकायत कहां करें?
आप जिला पूर्ति अधिकारी, गैस कंपनी हेल्पलाइन या उपभोक्ता पोर्टल पर शिकायत कर सकते हैं।
4. गोदाम की क्षमता से ज्यादा कनेक्शन होना गलत है?
नियमों के अनुसार क्षमता और कनेक्शन का अनुपात तय होता है, उससे ज्यादा होना जांच का विषय है।
5. क्या एजेंसी का लाइसेंस रद्द हो सकता है?
अगर आरोप सही पाए गए तो लाइसेंस निलंबित या रद्द किया जा सकता है।
सीतापुर में गैस एजेंसी का बड़ा खेल उजागर: 342 सिलेंडर का हिसाब गायब, गोदाम में मिले सिर्फ 4 भरे, ई-केवाईसी के नाम पर वसूली का आरोप