शादीशुदा व्यक्ति का दूसरे के साथ लिव-इन संबंध अवैध, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

शादीशुदा व्यक्ति का दूसरे के साथ लिव-इन संबंध अवैध, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
March 23, 2026 at 5:31 pm

लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर देशभर में चल रही बहस के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि कोई भी शादीशुदा व्यक्ति अपने वैवाहिक जीवनसाथी के रहते हुए किसी दूसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशन में रहने का कानूनी अधिकार नहीं रखता। कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति दूसरे के कानूनी अधिकारों का उल्लंघन करे। इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को सुरक्षा देने की मांग भी खारिज कर दी।

प्रयागराज स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ ने लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए अहम आदेश जारी किया। यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की बेंच ने दिया।

मामले में याची शांति देवी और अन्य लोगों ने कोर्ट से पुलिस सुरक्षा देने की मांग की थी। याचिका में कहा गया था कि वे दोनों बालिग हैं और साथ रहना चाहते हैं, लेकिन परिवार और समाज के लोग उनके संबंध में हस्तक्षेप कर रहे हैं।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि दो बालिगों को साथ रहने की स्वतंत्रता जरूर है, लेकिन यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं होती। अगर कोई व्यक्ति पहले से शादीशुदा है और उसने अपने जीवनसाथी से कानूनी रूप से तलाक नहीं लिया है, तो वह किसी दूसरे के साथ विवाह या लिव-इन संबंध में रहने का दावा नहीं कर सकता।

कोर्ट ने साफ कहा कि भारतीय कानून में विवाह एक वैध संस्था है और जब तक वह खत्म नहीं होती, तब तक किसी तीसरे व्यक्ति के साथ संबंध बनाना दूसरे जीवनसाथी के अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा। इसी आधार पर अदालत ने याचिकाकर्ताओं की सुरक्षा देने की मांग को अस्वीकार कर दिया।

भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को पूरी तरह अवैध नहीं माना गया है। कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दो बालिग अगर अपनी मर्जी से साथ रहते हैं, तो उसे अपराध नहीं माना जा सकता।

हालांकि, अदालतों ने यह भी स्पष्ट किया है कि लिव-इन संबंध को वैध मानने की कुछ शर्तें होती हैं। यदि कोई व्यक्ति पहले से शादीशुदा है और बिना तलाक लिए दूसरे के साथ रहने लगता है, तो यह विवाह कानूनों के खिलाफ माना जा सकता है।

हिंदू विवाह अधिनियम और अन्य व्यक्तिगत कानूनों के अनुसार, एक व्यक्ति एक समय में एक ही वैध विवाह कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति दूसरा विवाह करता है या वैवाहिक संबंध रहते हुए किसी और के साथ रहने लगता है, तो यह विवाद का कारण बन सकता है और कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।

हाईकोर्ट के इस फैसले का असर उन मामलों पर पड़ सकता है जहां शादीशुदा लोग लिव-इन रिलेशन का सहारा लेकर कानूनी सुरक्षा मांगते हैं।

इस निर्णय से स्पष्ट हो गया है कि

  • विवाह खत्म किए बिना दूसरा संबंध कानूनी सुरक्षा नहीं पा सकता
  • जीवनसाथी के अधिकारों को अदालत प्राथमिकता देगी
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मतलब कानून से ऊपर होना नहीं है

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला पारिवारिक विवादों, संपत्ति के मामलों और घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि

किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं तक सीमित है, जहां से दूसरे व्यक्ति का कानूनी अधिकार शुरू होता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर याचिकाकर्ताओं को किसी से खतरा है, तो वे सीधे पुलिस या संबंधित अधिकारियों से सुरक्षा मांग सकते हैं, लेकिन अदालत ऐसे संबंध को कानूनी संरक्षण नहीं दे सकती जो कानून के विरुद्ध हो।

अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दी गई शक्तियों का प्रयोग करते हुए ऐसे मामलों में सुरक्षा देना उचित नहीं होगा।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वैवाहिक कानूनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है।

पिछले कुछ वर्षों में लिव-इन रिलेशन को लेकर कई फैसले आए हैं, जिनमें अदालत ने साथ रहने की स्वतंत्रता को मान्यता दी, लेकिन इस मामले में कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता की भी सीमाएं होती हैं।

यह फैसला खास तौर पर उन मामलों में अहम है जहां

  • पति या पत्नी जीवित हैं
  • तलाक नहीं हुआ है
  • फिर भी दूसरा संबंध बनाया गया है

ऐसे मामलों में अदालत दूसरे जीवनसाथी के अधिकारों को प्राथमिकता दे रही है।

कानून विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला समाज में विवाह संस्था की कानूनी स्थिति को मजबूत करता है और यह संदेश देता है कि व्यक्तिगत फैसले लेते समय कानून का पालन जरूरी है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला लिव-इन रिलेशन और वैवाहिक कानूनों के बीच सीमा तय करने वाला माना जा रहा है। अदालत ने साफ कर दिया कि दो बालिगों को साथ रहने की स्वतंत्रता जरूर है, लेकिन शादीशुदा व्यक्ति बिना तलाक लिए किसी दूसरे के साथ रहने का दावा नहीं कर सकता।

यह निर्णय आने वाले समय में ऐसे कई मामलों के लिए मिसाल बन सकता है और अदालतों को दिशा देने का काम करेगा।

1. क्या भारत में लिव-इन रिलेशनशिप कानूनी है?
हाँ, दो बालिगों का सहमति से साथ रहना अपराध नहीं है, लेकिन कुछ शर्तें लागू होती हैं।

2. क्या शादीशुदा व्यक्ति लिव-इन में रह सकता है?
कोर्ट के अनुसार, बिना तलाक लिए ऐसा करना कानूनी विवाद पैदा कर सकता है।

3. क्या कोर्ट लिव-इन कपल को सुरक्षा देता है?
अगर संबंध कानून के अनुसार है तो सुरक्षा मिल सकती है, लेकिन अवैध स्थिति में नहीं।

4. क्या यह फैसला पूरे भारत पर लागू होगा?
हाईकोर्ट का फैसला मिसाल बन सकता है, लेकिन अंतिम व्याख्या सुप्रीम कोर्ट करता है।

5. अगर खतरा हो तो क्या करें?
ऐसी स्थिति में पुलिस या प्रशासन से सुरक्षा मांगी जा सकती है।