केजरीवाल के ‘शीशमहल’ पर CAG रिपोर्ट: 7.91 करोड़ से 33.66 करोड़ पहुंची लागत, नियमों के उल्लंघन के आरोप

केजरीवाल के ‘शीशमहल’ पर CAG रिपोर्ट: 7.91 करोड़ से 33.66 करोड़ पहुंची लागत, नियमों के उल्लंघन के आरोप
March 24, 2026 at 9:06 pm

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री Arvind Kejriwal के सरकारी आवास के विस्तार और नवीनीकरण से जुड़े प्रोजेक्ट को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General of India) की रिपोर्ट सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में फिर से बहस तेज हो गई है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री आवास परियोजना की लागत शुरुआती अनुमान से कई गुना बढ़ गई और काम के दौरान कई वित्तीय और प्रशासनिक नियमों का पालन नहीं किया गया।

ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार इस प्रोजेक्ट की लागत पहले 7.91 करोड़ रुपये तय की गई थी, लेकिन बाद में खर्च बढ़कर 33.66 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो मूल बजट से लगभग 342 प्रतिशत अधिक है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि काम के दौरान टेंडर प्रक्रिया, मंजूरी और खर्च से जुड़े नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया।

CAG की रिपोर्ट में बताया गया है कि मुख्यमंत्री आवास के नवीनीकरण और विस्तार के लिए जो योजना बनाई गई थी, वह समय के साथ लगातार बदलती रही। शुरुआती स्वीकृति के बाद कई अतिरिक्त काम जोड़े गए, जिनके लिए जरूरी प्रशासनिक मंजूरी नहीं ली गई।

रिपोर्ट के अनुसार लगभग 170 मदों में बदलाव किया गया, जिससे परियोजना की लागत तेजी से बढ़ती गई। सिविल कार्यों और इलेक्ट्रिकल कार्यों दोनों में अतिरिक्त भुगतान का मामला सामने आया है। ऑडिट में पाया गया कि कुछ कामों का भुगतान तय दर से ज्यादा किया गया और कई मामलों में लागत बढ़ाने का स्पष्ट कारण रिकॉर्ड में मौजूद नहीं था।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि करीब 18.88 करोड़ रुपये का काम बिना उचित स्वीकृति के कराया गया। इसके अलावा कुछ फंड को उस उद्देश्य से हटाकर दूसरे कामों में खर्च किया गया, जिसके लिए वह स्वीकृत नहीं था।

ऑडिट टीम ने यह भी कहा कि कुछ निर्माण कार्यों से जुड़े दस्तावेज, माप पुस्तिका और भुगतान से संबंधित वाउचर प्रस्तुत नहीं किए गए, जिससे खर्च की पुष्टि करना मुश्किल हो गया।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि परियोजना के दूसरे हिस्से, जिसमें स्टाफ ब्लॉक और अन्य कार्यालय निर्माण शामिल था, वह पूरा नहीं हो सका और काम अधूरा ही रोक दिया गया।

दिल्ली में मुख्यमंत्री का आधिकारिक आवास सिविल लाइंस क्षेत्र में स्थित है और यह लंबे समय से वीआईपी निवास के रूप में इस्तेमाल होता रहा है। मौजूदा सरकार के दौरान इस आवास के विस्तार और मरम्मत का प्रस्ताव रखा गया था, जिसमें सुरक्षा, कार्यालय और स्टाफ के लिए अतिरिक्त सुविधाएं बनाने की बात कही गई थी।

समय के साथ इस प्रोजेक्ट को लेकर राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि जरूरत से ज्यादा खर्च किया गया और सरकारी पैसे का दुरुपयोग हुआ। इसी विवाद के बाद इस परियोजना की जांच और ऑडिट की मांग उठी, जिसके बाद CAG ने विस्तृत रिपोर्ट तैयार की।

रिपोर्ट के सामने आने के बाद एक बार फिर इस मामले पर राजनीति तेज हो गई है और विभिन्न दल अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

इस रिपोर्ट का असर केवल दिल्ली की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी खर्च और जवाबदेही के बड़े मुद्दे को भी सामने लाता है। जब किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति के आवास से जुड़ी परियोजना में खर्च बढ़ने की खबर आती है, तो आम लोगों के बीच यह सवाल उठता है कि सरकारी धन का उपयोग कितनी पारदर्शिता से हो रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों से सरकारों पर वित्तीय अनुशासन बनाए रखने का दबाव बढ़ता है। इसके अलावा भविष्य में सरकारी निर्माण परियोजनाओं के लिए नियमों को और सख्त बनाने की मांग भी तेज हो सकती है।

जनता के बीच भी इस तरह की खबरों का असर पड़ता है, क्योंकि टैक्स के पैसे से होने वाले खर्च पर लोग अधिक जवाबदेही चाहते हैं।

रिपोर्ट के सामने आने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी आई हैं। विपक्षी दलों ने इसे सरकारी पैसे की बर्बादी बताते हुए जवाबदेही तय करने की मांग की है।

सरकारी पक्ष की ओर से कहा गया कि आवास के विस्तार का काम सुरक्षा और प्रशासनिक जरूरतों के कारण किया गया था और सभी खर्च नियमों के अनुसार किए गए। हालांकि ऑडिट रिपोर्ट में कुछ प्रक्रियागत कमियों का उल्लेख किया गया है, जिनकी समीक्षा की जा रही है।

PWD से जुड़े अधिकारियों ने भी कहा कि परियोजना कई चरणों में चली, इसलिए लागत बढ़ी, लेकिन इस पर अंतिम निर्णय संबंधित विभाग और सरकार द्वारा लिया जाएगा।

विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल एक आवास परियोजना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक प्रक्रिया की पारदर्शिता का सवाल भी है।

जब किसी परियोजना की लागत 300 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ती है, तो यह संकेत देता है कि योजना बनाते समय अनुमान सही नहीं लगाया गया या बाद में बदलाव बहुत ज्यादा हुए।

सरकारी कामों में अक्सर लागत बढ़ने की समस्या सामने आती है, लेकिन ऑडिट रिपोर्ट का उद्देश्य यही होता है कि भविष्य में ऐसी स्थिति से बचा जा सके।

इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सभी बदलाव जरूरी थे और क्या उन्हें सही तरीके से मंजूरी मिली थी। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो जिम्मेदारी तय करना जरूरी माना जाएगा।

CAG की रिपोर्ट ने मुख्यमंत्री आवास परियोजना को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। लागत में भारी बढ़ोतरी, प्रक्रियागत कमियां और अधूरा काम — इन सब बातों ने इस मामले को राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तर पर गंभीर बना दिया है।

अब यह देखना होगा कि सरकार इस रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई करती है और क्या भविष्य में सरकारी परियोजनाओं में खर्च और योजना को लेकर नए नियम बनाए जाते हैं।

इस तरह के मामलों से यह भी साफ होता है कि सरकारी खर्च पर निगरानी और पारदर्शिता लोकतंत्र के लिए कितनी जरूरी है।

1. परियोजना की लागत कितनी बढ़ी?
7.91 करोड़ से बढ़कर 33.66 करोड़ रुपये हो गई, जो लगभग 342% ज्यादा है।

2. रिपोर्ट किसने जारी की?
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने।

3. मुख्य आरोप क्या हैं?
बिना मंजूरी खर्च, टेंडर नियमों का उल्लंघन, अतिरिक्त भुगतान और रिकॉर्ड की कमी।

4. क्या काम पूरा हुआ था?
कुछ हिस्सा पूरा हुआ, लेकिन स्टाफ ब्लॉक और अन्य निर्माण अधूरा रहा।

5. सरकार की प्रतिक्रिया क्या है?
सरकारी पक्ष ने कहा कि काम जरूरत के अनुसार हुआ और रिपोर्ट की समीक्षा की जा रही है।