इच्छामृत्यु के बाद भी जीवनदान: गाजियाबाद के हरीश राणा ने नेत्रदान कर 6 लोगों की जिंदगी में भरी रोशनी

इच्छामृत्यु के बाद भी जीवनदान: गाजियाबाद के हरीश राणा ने नेत्रदान कर 6 लोगों की जिंदगी में भरी रोशनी
March 26, 2026 at 3:06 pm

गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा की कहानी केवल एक व्यक्ति की मृत्यु की कहानी नहीं है, बल्कि यह मानवता, त्याग और जीवनदान की मिसाल बन गई है। 13 वर्षों तक कोमा में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से उन्हें पैसिव यूथेनेशिया दिया गया, जिसके बाद उनका निधन हो गया। लेकिन जाते-जाते उन्होंने ऐसा काम किया, जिसने कई परिवारों की जिंदगी बदल दी। हरीश राणा के नेत्रों से लिए गए कॉर्नियल टिश्यू ने छह लोगों को नई रोशनी देने की उम्मीद जगाई है।

गाजियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से कोमा की स्थिति में थे। लंबे समय तक इलाज के बावजूद उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। परिवार ने कई अस्पतालों में इलाज कराया, लेकिन डॉक्टरों ने स्पष्ट कर दिया था कि उनके स्वस्थ होने की संभावना बेहद कम है। ऐसी स्थिति में उनके माता-पिता ने अदालत से इच्छा मृत्यु की अनुमति मांगी।

मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां मेडिकल रिपोर्ट और विशेषज्ञों की राय के आधार पर अदालत ने पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी। इसके बाद हरीश राणा को दिल्ली स्थित एम्स में भर्ती कराया गया, जहां निर्धारित प्रक्रिया के तहत उनका लाइफ सपोर्ट धीरे-धीरे हटाया गया।

मंगलवार को उनका निधन हो गया और बुधवार को दिल्ली के ग्रीन पार्क क्षेत्र में उनका अंतिम संस्कार किया गया। हालांकि अंतिम विदाई से पहले हरीश राणा ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने उनकी पहचान को हमेशा के लिए अमर बना दिया।

अस्पताल के सूत्रों के अनुसार, हरीश राणा के परिवार ने उनकी इच्छा के अनुसार नेत्रदान करने का निर्णय लिया। मेडिकल नियमों के कारण अन्य अंगों का उपयोग संभव नहीं था, लेकिन उनकी आंखों के कॉर्नियल टिश्यू पूरी तरह सुरक्षित थे। डॉक्टरों ने दोनों आंखों से कॉर्निया निकालकर आई बैंक में सुरक्षित रखा, जिससे छह लोगों की आंखों की रोशनी वापस लाई जा सकेगी।

विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक तकनीक के कारण अब पूरी आंख निकालने की जरूरत नहीं होती, बल्कि कॉर्निया की परतों को अलग-अलग मरीजों में प्रत्यारोपित किया जा सकता है। इसी वजह से एक व्यक्ति का नेत्रदान कई लोगों के लिए वरदान बन जाता है।

भारत में नेत्रदान को लेकर जागरूकता बढ़ी है, लेकिन अभी भी जरूरत के मुकाबले दान बहुत कम होता है। एम्स दिल्ली के नेशनल आई बैंक के आंकड़ों के अनुसार पिछले कई दशकों में हजारों कॉर्निया जमा किए गए, जिनसे हजारों मरीजों की रोशनी लौटाई जा चुकी है।

कॉर्निया आंख की सबसे बाहरी पारदर्शी परत होती है, जो प्रकाश को आंख के अंदर जाने में मदद करती है। जब यह परत खराब हो जाती है, तो व्यक्ति को धुंधला दिखने लगता है या वह अंधेपन का शिकार हो सकता है। ऐसे मरीजों के लिए कॉर्नियल ट्रांसप्लांट ही एकमात्र इलाज होता है।

भारत में हर साल लाखों लोग कॉर्निया की बीमारी से पीड़ित होते हैं, लेकिन दान की कमी के कारण सभी का इलाज नहीं हो पाता। यही वजह है कि डॉक्टर लगातार लोगों से नेत्रदान करने की अपील करते रहते हैं।

हरीश राणा के नेत्रदान का प्रभाव केवल छह लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में एक मजबूत संदेश देता है कि मृत्यु के बाद भी जीवनदान संभव है।

इस घटना ने लोगों को अंगदान और नेत्रदान के प्रति जागरूक किया है। कई सामाजिक संगठनों ने भी इस फैसले की सराहना की है और कहा है कि अगर अधिक लोग इस तरह आगे आएं, तो देश में अंधत्व की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है।

भारत जैसे देश में जहां लाखों लोग कॉर्निया की बीमारी से पीड़ित हैं, वहां इस तरह के उदाहरण समाज को प्रेरित करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हर परिवार इस विषय पर खुलकर बात करे, तो अंगदान की संख्या कई गुना बढ़ सकती है।

एम्स दिल्ली के डॉक्टरों ने बताया कि आधुनिक नेत्र प्रत्यारोपण तकनीक की वजह से एक व्यक्ति के कॉर्निया से कई मरीजों को लाभ मिल सकता है।

डॉक्टरों के अनुसार,
“अब पूरी आंख निकालने के बजाय केवल कॉर्नियल टिश्यू लिया जाता है, जिसे अलग-अलग मरीजों में लगाया जा सकता है। यही कारण है कि एक दान कई लोगों के जीवन में रोशनी ला सकता है।”

आई बैंक से जुड़े विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि अस्पतालों में आई डोनेशन प्रोग्राम के कारण अब अधिक कॉर्निया सुरक्षित किए जा रहे हैं, जिससे जरूरतमंद मरीजों का इलाज आसान हुआ है।

हरीश राणा का मामला केवल इच्छा मृत्यु का मामला नहीं है, बल्कि यह भारत में मेडिकल कानून, नैतिकता और मानवता के संतुलन का उदाहरण भी है।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही सख्त शर्तों के साथ पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी है, ताकि मरीज और परिवार की पीड़ा को कम किया जा सके। इस मामले में अदालत ने मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर फैसला लिया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कानून संवेदनशील मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाता है।

दूसरी ओर, नेत्रदान का फैसला यह दिखाता है कि समाज में जागरूकता बढ़ रही है। पहले लोग अंगदान से डरते थे, लेकिन अब लोग इसे सेवा और पुण्य का काम मानने लगे हैं।

यह घटना स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी एक संदेश है कि अंगदान और आई बैंक की सुविधाओं को और मजबूत किया जाए, ताकि अधिक लोगों को फायदा मिल सके।

हरीश राणा की कहानी दुखद जरूर है, लेकिन यह प्रेरणादायक भी है। 13 साल तक कोमा में रहने के बाद उनका जीवन भले ही खत्म हो गया, लेकिन उनके नेत्रदान ने कई लोगों की जिंदगी में नई शुरुआत कर दी।

यह घटना हमें याद दिलाती है कि इंसान की असली पहचान उसके जाने के बाद किए गए काम से होती है। अगर अधिक लोग अंगदान और नेत्रदान के लिए आगे आएं, तो हजारों लोगों को नई जिंदगी मिल सकती है।

1. नेत्रदान क्या होता है?
नेत्रदान में मृत्यु के बाद आंख के कॉर्निया को निकालकर जरूरतमंद मरीज में प्रत्यारोपित किया जाता है।

2. एक व्यक्ति के नेत्रदान से कितने लोगों को फायदा होता है?
आधुनिक तकनीक से एक व्यक्ति के कॉर्निया से कई लोगों की आंखों की रोशनी लौटाई जा सकती है।

3. क्या इच्छा मृत्यु के बाद अंगदान संभव है?
कुछ मामलों में नहीं, लेकिन कॉर्नियल टिश्यू का उपयोग कई बार संभव होता है।

4. कॉर्निया क्या होता है?
कॉर्निया आंख की पारदर्शी परत होती है, जो रोशनी को अंदर जाने में मदद करती है।

5. नेत्रदान कैसे करें?
कोई भी व्यक्ति जीवित रहते हुए नेत्रदान की प्रतिज्ञा कर सकता है और मृत्यु के बाद परिवार की अनुमति से यह प्रक्रिया की जाती है।