हिंदू पंचांग में आज से अधिकमास यानी पुरुषोत्तम मास की शुरुआत हो चुकी है। धार्मिक दृष्टि से यह महीना अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाता है। सनातन परंपरा में इसका विशेष स्थान है क्योंकि यह केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मचिंतन, संयम, दान-पुण्य और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर भी माना जाता है। यह महीना सामान्य महीनों की तरह हर साल नहीं आता, बल्कि लगभग हर तीन वर्ष में एक बार पंचांग में जुड़ता है। मान्यता है कि इस दौरान की गई भक्ति, साधना और अच्छे कार्यों का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है।
इस बार अधिकमास का समापन 15 जून को होगा और इसे दुर्लभ ज्येष्ठ अधिकमास भी माना जा रहा है। देशभर में मंदिरों, धार्मिक स्थलों और श्रद्धालुओं के बीच इस अवधि को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है।
अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसका संबंध भगवान विष्णु से माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि इस महीने को पहले “मलमास” कहा जाता था, क्योंकि इसका कोई विशेष स्वामी नहीं माना जाता था। बाद में भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम “पुरुषोत्तम” देकर सम्मान प्रदान किया, जिसके बाद इसका धार्मिक महत्व अत्यधिक बढ़ गया।
इस पूरे महीने भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और राम की आराधना का विशेष महत्व बताया गया है। धर्मशास्त्रों में इसे मन और आत्मा को शुद्ध करने वाला काल माना गया है। कई लोग इस दौरान व्रत रखते हैं, धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करते हैं और जरूरतमंद लोगों की सेवा करते हैं।
भारत में विभिन्न राज्यों में इस महीने के दौरान भजन-कीर्तन, कथा, यज्ञ और धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। मंदिरों में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है और लोग अपने जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शांति प्राप्त करने की कामना करते हैं।
अधिकमास कैसे बनता है?
हिंदू पंचांग पूरी तरह चंद्र और सूर्य की गति के संतुलन पर आधारित है। चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है जबकि सूर्य वर्ष लगभग 365 दिनों का माना जाता है। इस प्रकार दोनों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर आ जाता है।
यह अंतर हर वर्ष जमा होता रहता है और लगभग तीन वर्षों में एक पूरे महीने के बराबर हो जाता है। इस अंतर को संतुलित करने के लिए पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है।
धार्मिक गणना के अनुसार जिस चंद्र मास के दौरान सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश नहीं करता, यानी संक्रांति नहीं होती, वह मास अधिकमास कहलाता है।
यह व्यवस्था केवल धार्मिक नहीं बल्कि खगोलीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इससे पंचांग और ऋतु चक्र के बीच संतुलन बना रहता है।
भारतीय संस्कृति में पंचांग केवल तिथियों का गणित नहीं बल्कि जीवन शैली का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। विवाह, त्योहार, व्रत और कृषि जैसे कई कार्य पंचांग के अनुसार निर्धारित किए जाते हैं।
अधिकमास का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों जैसे पुराण, भागवत और धर्मशास्त्रों में मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस महीने में सांसारिक भोग-विलास से दूरी बनाकर आध्यात्मिक गतिविधियों में समय देना अधिक लाभकारी माना जाता है।
इसी कारण कई लोग इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों को टालते हैं और पूजा-पाठ को प्राथमिकता देते हैं।
पुरुषोत्तम मास का प्रभाव केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता बल्कि इसका सामाजिक और आर्थिक असर भी दिखाई देता है।
देशभर में धार्मिक पर्यटन में वृद्धि देखने को मिलती है। मंदिरों, तीर्थस्थलों और धार्मिक आयोजनों में लोगों की भीड़ बढ़ जाती है। पूजा सामग्री, धार्मिक पुस्तकों और दान से जुड़े कार्यों में भी तेजी आती है।
सामाजिक स्तर पर जरूरतमंद लोगों की सहायता और दान की प्रवृत्ति बढ़ती है। गरीबों को भोजन कराना, वस्त्र देना और सेवा कार्यों में भागीदारी बढ़ने से समाज में सकारात्मक संदेश जाता है।
मानसिक दृष्टि से भी यह अवधि कई लोगों के लिए आत्मनिरीक्षण और तनाव कम करने का माध्यम बनती है।
धार्मिक विद्वानों और ज्योतिषाचार्यों के अनुसार अधिकमास केवल कर्मकांड का समय नहीं बल्कि जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का अवसर भी है।
धर्म विशेषज्ञों का कहना है कि श्रद्धा और सच्चे मन से की गई प्रार्थना, दान और सेवा व्यक्ति के मानसिक और आध्यात्मिक विकास में सहायक हो सकती है। हालांकि किसी भी धार्मिक कार्य को अंधविश्वास के बजाय आस्था और विवेक के साथ करने की सलाह दी जाती है।
अधिकमास में क्या करें?
इस अवधि में कई धार्मिक कार्यों को शुभ माना गया है:
किन चीजों का दान शुभ माना गया है?
ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिकमास में निम्न दान शुभ माने जाते हैं:
मान्यता है कि श्रद्धा के साथ किया गया दान सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक संतोष प्रदान करता है।
अधिकमास केवल धार्मिक अवधारणा नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की गहराई को दर्शाने वाली परंपरा भी है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में जहां लोग मानसिक तनाव और व्यस्तता से जूझ रहे हैं, ऐसे समय में आत्मचिंतन और आध्यात्मिकता का यह अवसर महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक जिम्मेदारी को जोड़ा जाए तो ऐसे अवसर समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। जरूरतमंदों की सहायता और सेवा कार्यों को बढ़ावा देना भी अधिकमास की मूल भावना के अनुरूप माना जा सकता है।
पुरुषोत्तम मास आस्था, अनुशासन और सेवा का प्रतीक माना जाता है। यह महीना केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है बल्कि व्यक्ति को अपने भीतर झांकने और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का अवसर भी देता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान किए गए सत्कर्म, दान और पूजा विशेष फलदायी माने जाते हैं। हालांकि किसी भी परंपरा का पालन समझ और संतुलन के साथ करना अधिक महत्वपूर्ण है।
1. पुरुषोत्तममास और अधिकमास में क्या अंतर है?
कोई अंतर नहीं है। अधिकमास को भगवान विष्णु द्वारा पुरुषोत्तम नाम दिए जाने के बाद इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाने लगा।
2. अधिकमास कितने साल में आता है?
लगभग हर तीन वर्ष में एक बार अधिकमास आता है।
3. क्या अधिकमास में शादी-विवाह किए जाते हैं?
परंपरागत मान्यताओं के अनुसार इस दौरान मांगलिक कार्यों से बचा जाता है।
4. अधिकमास में किस भगवान की पूजा महत्वपूर्ण मानी जाती है?
भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और भगवान राम की पूजा विशेष मानी जाती है।
5. अधिकमास में सबसे शुभदान क्या माना जाता है?
अन्न, वस्त्र, घी, फल और जरूरतमंदों को भोजन कराना शुभ माना जाता है।
पुरुषोत्तम मास 2026 की शुरुआत: कैसे बनता है अधिकमास, क्या करें, क्या न करें और कौन-से दान बदल सकते हैं भाग्य