देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में नागरिकों से ईंधन का इस्तेमाल सोच-समझकर करने और अनावश्यक यात्रा से बचने की अपील की है। पीएम की यह सलाह ऐसे समय आई है जब पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार और सरकारी तेल कंपनियां आम जनता पर महंगाई का बोझ कम रखने के लिए खुद भारी वित्तीय दबाव झेल रही हैं।
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी साफ संकेत दिए हैं कि तेल कंपनियों को रोजाना हजारों करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसे में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि यदि सरकार तेल कंपनियों का घाटा पूरी तरह खत्म करना चाहे तो पेट्रोल और डीजल के दाम में आखिर कितनी बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल सप्लाई प्रभावित होने की आशंका ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से पेट्रोल और डीजल का इस्तेमाल ‘संयम’ के साथ करने की अपील करते हुए कहा कि जिस तरह कोविड महामारी के दौरान लोगों ने जिम्मेदारी दिखाई थी, उसी तरह ऊर्जा बचत को भी राष्ट्रीय जिम्मेदारी समझना चाहिए। प्रधानमंत्री का यह संदेश केवल बचत की सलाह नहीं, बल्कि संभावित ऊर्जा संकट की गंभीरता को भी दर्शाता है।
इसके बाद केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल, गैस और एलपीजी बेहद महंगे दामों पर खरीदे जा रहे हैं, लेकिन सरकार आम लोगों को राहत देने के लिए घरेलू बाजार में कीमतें नियंत्रित रखे हुए है। इसका सीधा असर सरकारी तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर पड़ रहा है।
सरकारी अनुमान के मुताबिक तेल विपणन कंपनियों को प्रतिदिन करीब 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। चालू तिमाही में यह घाटा लगभग 1 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। सबसे अधिक दबाव पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की बिक्री पर बताया जा रहा है।
कितना बढ़ सकता है पेट्रोल-डीजल का दाम?
ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान हालात में तेल कंपनियों को पेट्रोल पर लगभग 18 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर करीब 25 रुपये प्रति लीटर का नुकसान उठाना पड़ रहा है। यदि सरकार इन घाटों की पूरी भरपाई करना चाहे तो पेट्रोल की कीमत में 18 रुपये और डीजल में 25 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है।
हालांकि, सरकार के लिए ऐसा फैसला आसान नहीं होगा क्योंकि इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे खाद्य पदार्थों, रोजमर्रा के सामान और औद्योगिक उत्पादों की कीमतें भी बढ़ जाती हैं।
भारत जैसे देश में जहां बड़ी आबादी मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग से जुड़ी है, वहां ईंधन कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी राजनीतिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर संवेदनशील मुद्दा बन सकती है।
भारत लंबे समय से ऊर्जा आयात पर निर्भर रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक तेल बाजार पहले ही अस्थिर हो चुका था। अब पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में गिना जाता है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी रास्ते से गुजरता है। यदि यहां सप्लाई बाधित होती है तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन अभी भी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए आयातित तेल पर भारी निर्भरता बनी हुई है।
इसी बीच सरकार ने मार्च के अंत में पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी। इस फैसले से सरकार को हर महीने लगभग 14 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है। बावजूद इसके, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल इतना ज्यादा है कि टैक्स कटौती भी तेल कंपनियों को राहत नहीं दे पा रही।
यदि भविष्य में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी होती है तो इसका असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव पूरे आर्थिक ढांचे पर दिखाई देगा।
ट्रांसपोर्ट सेक्टर की लागत बढ़ने से फल-सब्जियों और जरूरी सामान की कीमतें बढ़ सकती हैं। एयरलाइन कंपनियों पर भी दबाव बढ़ेगा क्योंकि एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) महंगा हो रहा है। इसका असर हवाई किराए पर पड़ सकता है।
उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ने से महंगाई दर में उछाल आ सकता है। ग्रामीण इलाकों में खेती-किसानी की लागत भी बढ़ सकती है क्योंकि डीजल का उपयोग सिंचाई और कृषि उपकरणों में बड़े पैमाने पर होता है।
इसके अलावा, सरकार के वित्तीय घाटे पर भी असर पड़ सकता है क्योंकि तेल कंपनियों को राहत देने के लिए अतिरिक्त सहायता देनी पड़ सकती है।
पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने हाल ही में कहा था कि पश्चिम एशिया संकट के कारण तेल कंपनियों पर गंभीर वित्तीय दबाव बना हुआ है। उन्होंने माना कि केवल पेट्रोल और डीजल ही नहीं, बल्कि एलपीजी और एविएशन फ्यूल की बिक्री पर भी नुकसान हो रहा है।
केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि सरकार की प्राथमिकता आम लोगों को राहत देना है, इसलिए वैश्विक कीमतों का पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जा रहा। उन्होंने ऊर्जा बचत को राष्ट्रीय जिम्मेदारी बताते हुए नागरिकों से सहयोग की अपील की।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार फिलहाल सीधे तौर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी से बचना चाहेगी। इसके बजाय सरकार चरणबद्ध तरीके से कीमतों में संशोधन कर सकती है या फिर तेल कंपनियों को वित्तीय सहायता देने का रास्ता चुन सकती है।
कुछ जानकारों का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो सरकार के लिए मौजूदा व्यवस्था बनाए रखना मुश्किल होगा।
ऊर्जा विश्लेषकों का यह भी मानना है कि यह स्थिति भारत के लिए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने का संकेत है। इलेक्ट्रिक वाहन, एथेनॉल मिश्रण और सौर ऊर्जा जैसे विकल्प आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अहम भूमिका निभा सकते हैं।
इसके अलावा, विशेषज्ञ लोगों को भी ईंधन बचत के लिए सार्वजनिक परिवहन, कार पूलिंग और अनावश्यक यात्रा से बचने की सलाह दे रहे हैं।
पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर देश एक चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। वैश्विक संकट का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई दे रहा है। सरकार फिलहाल जनता को राहत देने की कोशिश कर रही है, लेकिन तेल कंपनियों पर बढ़ता वित्तीय दबाव चिंता का विषय बन चुका है।
आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय हालात और सरकारी रणनीति तय करेगी कि ईंधन कीमतों में कितना बदलाव होगा। फिलहाल, ऊर्जा बचत और वैकल्पिक साधनों की ओर बढ़ना ही सबसे व्यावहारिक विकल्प माना जा रहा है।
1. तेल कंपनियों को कितना नुकसान हो रहा है?
सरकारी अनुमान के मुताबिक तेल कंपनियों को रोजाना करीब 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।
2. पेट्रोल और डीजल के दाम कितने बढ़ सकते हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार घाटा पूरी तरह खत्म करने के लिए पेट्रोल में करीब 18 रुपये और डीजल में 25 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है।
3. कच्चे तेल की कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?
पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट के कारण वैश्विक सप्लाई प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।
4. क्या सरकार तुरंत दाम बढ़ाएगी?
फिलहाल सरकार आम लोगों पर बोझ कम रखने की कोशिश कर रही है। हालांकि भविष्य की स्थिति अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर करेगी।
5. आम लोगों पर इसका क्या असर पड़ेगा?
ईंधन महंगा होने से ट्रांसपोर्ट, खाद्य सामग्री, हवाई यात्रा और रोजमर्रा के सामान की कीमतें बढ़ सकती हैं।
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