होर्मुज तनाव के बीच भारत-रूस का बड़ा रक्षा कदम, RELOS समझौते से सैन्य साझेदारी मजबूत

होर्मुज तनाव के बीच भारत-रूस का बड़ा रक्षा कदम, RELOS समझौते से सैन्य साझेदारी मजबूत
April 19, 2026 at 11:01 am

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास हालिया घटनाओं ने वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था को एक बार फिर चिंता में डाल दिया है। इसी बीच भारत और रूस ने अपनी दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी को नए स्तर पर ले जाने का फैसला किया है। दोनों देशों के बीच हुए एक अहम रक्षा समझौते के तहत अब वे एक-दूसरे की जमीन पर सीमित सैन्य तैनाती कर सकेंगे। इस कदम को वैश्विक शक्ति संतुलन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारत और रूस के बीच हुए ‘रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट’ (RELOS) के तहत दोनों देश एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों का उपयोग कर सकेंगे। इस समझौते के अनुसार, किसी भी समय अधिकतम 3,000 सैनिक, 10 सैन्य विमान और 5 युद्धपोत एक-दूसरे के क्षेत्र में तैनात किए जा सकते हैं।

यह समझौता फरवरी 2025 में हस्ताक्षरित हुआ था और 12 जनवरी 2026 से प्रभावी हो चुका है। रूस ने इसे दिसंबर 2025 में औपचारिक मंजूरी दी। इसका उद्देश्य केवल सैन्य उपस्थिति बढ़ाना नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच लॉजिस्टिक सहयोग को मजबूत करना भी है।

इस व्यवस्था के तहत सैन्य जहाजों को बंदरगाह सुविधाएं, मरम्मत, ईंधन, भोजन और तकनीकी सहायता मिलेगी। वहीं, वायुसेना के विमानों को एयर ट्रैफिक कंट्रोल, नेविगेशन और सुरक्षा से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।

भारत और रूस के बीच रक्षा संबंध कोई नए नहीं हैं। शीत युद्ध के दौर से ही दोनों देशों के बीच गहरा सैन्य सहयोग रहा है। भारत की सेना में आज भी बड़ी संख्या में रूसी मूल के हथियार और प्लेटफॉर्म उपयोग में हैं, जिनमें फाइटर जेट, टैंक और मिसाइल सिस्टम शामिल हैं।

हाल के वर्षों में वैश्विक राजनीति में तेजी से बदलाव आया है। ईरान और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ते तनाव, साथ ही अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने दुनिया को नए शक्ति संतुलन की ओर धकेला है। ऐसे समय में भारत और रूस का यह कदम दोनों देशों की आपसी भरोसे को दर्शाता है।

इस समझौते का असर केवल सैन्य स्तर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका व्यापक प्रभाव भारत, क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक राजनीति पर पड़ेगा।

भारत के लिए यह समझौता कई मायनों में फायदेमंद है। इससे भारतीय सेना को रूस के रणनीतिक क्षेत्रों, खासकर आर्कटिक क्षेत्र तक पहुंच मिल सकती है। वहीं, रूस को भारत के हिंद महासागर क्षेत्र में मौजूद सैन्य ढांचे का लाभ मिलेगा।

आम नागरिकों के लिए इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव सुरक्षा के रूप में सामने आएगा। वैश्विक व्यापार, खासकर तेल आपूर्ति, काफी हद तक होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर है। ऐसे में भारत की सक्रिय भूमिका ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत कर सकती है।

रूस की संसद की अंतरराष्ट्रीय मामलों की समिति के उपाध्यक्ष व्याचेस्लाव निकोनोव ने इस समझौते की पुष्टि करते हुए कहा कि यह दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग को नई दिशा देगा। उन्होंने इसे “विश्वास और साझेदारी का मजबूत उदाहरण” बताया।

भारत की ओर से आधिकारिक बयान में कहा गया है कि यह समझौता रक्षा सहयोग, संयुक्त अभ्यास और मानवीय सहायता अभियानों को अधिक प्रभावी बनाएगा।

अगर इस समझौते को गहराई से देखें तो यह केवल एक सैन्य समझौता नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी है। भारत एक संतुलित विदेश नीति अपनाता रहा है, जिसमें वह पश्चिमी देशों के साथ भी सहयोग करता है और रूस जैसे पारंपरिक साझेदारों के साथ भी संबंध बनाए रखता है।

यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब वैश्विक स्तर पर गठबंधन बदल रहे हैं। अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा, यूरोप में अस्थिरता और मध्य पूर्व में संघर्ष ने दुनिया को अनिश्चितता के दौर में डाल दिया है।

भारत-रूस समझौता यह संकेत देता है कि दोनों देश बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपनी भूमिका मजबूत करना चाहते हैं। यह भारत के लिए रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने का भी एक प्रयास है।

भारत और रूस के बीच RELOS समझौता केवल सैन्य सहयोग का विस्तार नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच एक मजबूत साझेदारी का प्रतीक है। होर्मुज जैसे संवेदनशील क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच यह कदम भारत की रणनीतिक तैयारी और वैश्विक भूमिका को दर्शाता है। आने वाले समय में यह समझौता क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षा के लिए अहम साबित हो सकता है।

1. RELOS समझौता क्या है?
यह भारत और रूस के बीच एक लॉजिस्टिक एक्सचेंज समझौता है, जिससे दोनों देश एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों का उपयोग कर सकते हैं।

2. इस समझौते के तहत कितनी सैन्य तैनाती संभव है?
अधिकतम 3,000 सैनिक, 10 सैन्य विमान और 5 युद्धपोत तैनात किए जा सकते हैं।

3. इसका भारत को क्या फायदा होगा?
भारत को रूस के रणनीतिक क्षेत्रों तक पहुंच और सैन्य सहयोग में मजबूती मिलेगी।

4. क्या यह समझौता किसी देश के खिलाफ है?
नहीं, यह एक द्विपक्षीय सहयोग समझौता है और इसका उद्देश्य रक्षा साझेदारी बढ़ाना है।

5. इसका आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
अप्रत्यक्ष रूप से यह राष्ट्रीय सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत करेगा।