देश के प्रमुख चिकित्सा संस्थान All India Institute of Medical Sciences (एम्स) ने आंखों की खतरनाक बीमारी ग्लूकोमा यानी काला मोतिया की पहचान के लिए एक आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सॉफ्टवेयर विकसित किया है। यह तकनीक इतनी तेज और सटीक बताई जा रही है कि सिर्फ आंख की फोटो देखकर सेकेंडों में बीमारी का खतरा बता सकती है। इस सॉफ्टवेयर को एम्स के आरपी सेंटर फॉर ऑप्थेल्मिक साइंसेज के विशेषज्ञों ने तैयार किया है, ताकि उन जगहों पर भी आंखों की जांच संभव हो सके जहां महंगी मशीनें उपलब्ध नहीं हैं।
एम्स दिल्ली के आरपी सेंटर ने जो एआई सॉफ्टवेयर तैयार किया है, वह आंख के रेटिना और ऑप्टिक नर्व की फोटो का विश्लेषण करके यह बता सकता है कि मरीज को ग्लूकोमा है या नहीं। ग्लूकोमा ऐसी बीमारी है जो धीरे-धीरे आंख की नस को नुकसान पहुंचाती है और समय पर इलाज न मिलने पर स्थायी अंधेपन का कारण बन सकती है।
इस नई तकनीक की खास बात यह है कि इसके लिए किसी बड़ी मशीन या जटिल जांच की जरूरत नहीं होगी। किसी भी स्मार्टफोन या सामान्य फंडस कैमरा से ली गई आंख की फोटो को सॉफ्टवेयर में अपलोड किया जाएगा और कुछ ही सेकेंड में रिपोर्ट मिल जाएगी।
इस सॉफ्टवेयर को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इसका इस्तेमाल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, जिला अस्पताल, आरोग्य केंद्र और छोटे सरकारी अस्पतालों में आसानी से किया जा सके। इससे उन क्षेत्रों में भी ग्लूकोमा की जांच संभव होगी जहां अभी तक इंट्राऑक्यूलर प्रेशर मापने या ऑप्टिक नर्व की जांच की सुविधा उपलब्ध नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक बड़े शहरों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए भी बहुत उपयोगी साबित होगी, क्योंकि ज्यादातर मामलों में मरीज को बीमारी का पता बहुत देर से चलता है।
ग्लूकोमा को आंखों का “साइलेंट किलर” कहा जाता है क्योंकि इसके शुरुआती चरण में कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते। जब तक मरीज को नजर कम होने का अहसास होता है, तब तक ऑप्टिक नर्व को काफी नुकसान हो चुका होता है।
भारत में लाखों लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं, लेकिन बड़ी संख्या में मरीजों को इसका पता ही नहीं चल पाता। इसकी सबसे बड़ी वजह है नियमित स्क्रीनिंग की कमी और जांच के लिए जरूरी उपकरणों का हर जगह उपलब्ध न होना।
आंखों के विशेषज्ञों के अनुसार
इन्हीं समस्याओं को ध्यान में रखते हुए एम्स ने एआई आधारित स्क्रीनिंग टूल तैयार किया है।
इस तकनीक के आने से भारत के स्वास्थ्य तंत्र पर बड़ा सकारात्मक असर पड़ सकता है।
पहला, ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को समय पर जांच मिल सकेगी।
दूसरा, महंगी मशीनों पर निर्भरता कम होगी और जांच का खर्च घटेगा।
तीसरा, बड़ी संख्या में मरीजों की शुरुआती अवस्था में पहचान हो सकेगी जिससे अंधेपन के मामलों में कमी आ सकती है।
चौथा, सरकारी अस्पतालों पर अचानक आने वाले गंभीर मरीजों का बोझ कम होगा क्योंकि पहले ही स्क्रीनिंग हो जाएगी।
अगर इस तकनीक को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया गया तो यह भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में बड़ी भूमिका निभा सकती है।
आरपी सेंटर में ग्लूकोमा सेवाओं के प्रमुख और वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. तनुज दादा ने कहा कि ग्लूकोमा ऐसी बीमारी है जिसमें मरीज को लंबे समय तक कोई लक्षण महसूस नहीं होता, इसलिए नियमित स्क्रीनिंग बहुत जरूरी है। उन्होंने बताया कि एआई सॉफ्टवेयर का उद्देश्य यही है कि हर व्यक्ति तक जांच की सुविधा पहुंच सके।
उनके अनुसार यह तकनीक उन अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों के लिए खास तौर पर बनाई गई है जहां विशेषज्ञ डॉक्टर या आधुनिक मशीनें उपलब्ध नहीं हैं। इस सॉफ्टवेयर की मदद से वहां भी शुरुआती जांच की जा सकेगी और जरूरत होने पर मरीज को बड़े अस्पताल में भेजा जाएगा।
भारत जैसे देश में जहां बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, वहां स्वास्थ्य सेवाओं को हर व्यक्ति तक पहुंचाना चुनौतीपूर्ण है। आंखों की बीमारियों के मामले में यह समस्या और गंभीर हो जाती है क्योंकि जांच के लिए विशेष उपकरण और प्रशिक्षित डॉक्टर की जरूरत होती है।
एआई आधारित यह तकनीक स्वास्थ्य सेवाओं के डिजिटल भविष्य की ओर संकेत करती है। आने वाले समय में ऐसे सॉफ्टवेयर कई अन्य बीमारियों की पहचान में भी मदद कर सकते हैं। इससे टेलीमेडिसिन और डिजिटल हेल्थ मिशन को भी मजबूती मिलेगी।
हालांकि, इस तकनीक को पूरे देश में लागू करने के लिए प्रशिक्षण, डेटा सुरक्षा, और सही उपयोग सुनिश्चित करना जरूरी होगा। अगर इन बातों का ध्यान रखा गया तो यह सिस्टम भारत में अंधेपन के मामलों को कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
एम्स द्वारा विकसित एआई सॉफ्टवेयर आंखों की जांच के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इससे ग्लूकोमा जैसी गंभीर बीमारी का पता अब जल्दी और सस्ती जांच से लगाया जा सकेगा। खास बात यह है कि यह तकनीक शहरों के साथ-साथ गांवों तक पहुंचेगी, जिससे लाखों लोगों की आंखों की रोशनी बचाई जा सकती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस तकनीक को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया गया तो यह भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव ला सकती है।
1. ग्लूकोमा क्या होता है?
ग्लूकोमा आंख की नस को नुकसान पहुंचाने वाली बीमारी है, जिससे धीरे-धीरे नजर कम हो सकती है।
2. नया ए आई सॉफ्टवेयर कैसे काम करता है?
यह आंख की फोटो का विश्लेषण करके ऑप्टिक नर्व की स्थिति जांचता है और बीमारी का खतरा बताता है।
3. क्या इसके लिए बड़ी मशीन जरूरी है?
नहीं, स्मार्टफोन या सामान्य कैमरे से ली गई फोटो भी इस्तेमाल की जा सकती है।
4. किन लोगों को नियमित जांच करानी चाहिए?
40 साल से ऊपर के सभी लोगों को और 60 साल से ऊपर के लोगों को हर साल जांच करानी चाहिए।
5. क्या यह तकनीक गांवों में भी इस्तेमाल होगी?
हाँ, इसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और जिला अस्पतालों तक पहुंचाने की योजना है।
एम्स ने बनाया AI सॉफ्टवेयर, अब आंख की फोटो से ही चलेगा काला मोतिया का पता, गांव-गांव तक पहुंचेगी जांच