अभी की गर्मी सिर्फ ट्रेलर है! ‘सुपर अल नीनो’ का बढ़ता खतरा, क्या धरती बनने जा रही है धधकती भट्टी?

अभी की गर्मी सिर्फ ट्रेलर है! ‘सुपर अल नीनो’ का बढ़ता खतरा, क्या धरती बनने जा रही है धधकती भट्टी?
May 22, 2026 at 1:11 pm

देश के कई हिस्सों में मई-जून की गर्मी ने अभी से लोगों का जीना मुश्किल करना शुरू कर दिया है। राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य भारत के कई क्षेत्रों में तापमान तेजी से बढ़ रहा है। इसी बीच मौसम वैज्ञानिकों और जलवायु विशेषज्ञों की एक नई चेतावनी ने चिंता बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार प्रशांत महासागर में बनने वाला ‘एल नीन्यो’ सामान्य नहीं, बल्कि बेहद शक्तिशाली ‘सुपर अल नीनो’ में बदल सकता है। यदि ऐसा हुआ तो इसका असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया के मौसम तंत्र पर दिखाई देगा। भारत में कमजोर मानसून, लंबी लू, सूखे की आशंका और कृषि संकट जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं।

मौसम विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, प्रशांत महासागर के मध्य हिस्से में समुद्री सतह का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार कुछ इलाकों में तापमान सामान्य स्तर से करीब 0.9 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह बढ़ोतरी 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ऊपर पहुंचती है, तो इसे ‘सुपर अल नीनो’ माना जाएगा।

सामान्य तौर पर एल नीन्यो एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है, लेकिन जब इसकी तीव्रता बहुत अधिक हो जाती है तो इसका प्रभाव दुनिया के मौसम चक्र को असंतुलित कर देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कई दशकों में ऐसे हालात बहुत कम बार बने हैं, लेकिन जब भी बने, उन्होंने वैश्विक स्तर पर गंभीर मौसमीय संकट पैदा किया।

भारत के लिए चिंता इसलिए ज्यादा है क्योंकि देश की कृषि व्यवस्था, जल संसाधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है। यदि मानसून कमजोर हुआ तो खेती से लेकर पीने के पानी तक कई क्षेत्रों में असर दिखाई दे सकता है।

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सुपर अल नीनो मजबूत होता है तो राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में तापमान 46 से 48 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तक पहुंच सकता है। इससे हीटवेव की घटनाएं बढ़ सकती हैं और शहरों में ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव और गंभीर हो सकता है।

‘एल नीन्यो’ शब्द स्पेनिश भाषा से आया है, जिसका अर्थ है ‘छोटा बच्चा’। दक्षिण अमेरिका के पेरू और आसपास के क्षेत्रों के मछुआरों ने सबसे पहले इस घटना को पहचाना था। उन्होंने देखा कि हर वर्ष क्रिसमस के आसपास समुद्र का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता था। इस कारण उन्होंने इसे ईसा मसीह के बाल रूप से जोड़ते हुए ‘एल नीन्यो’ नाम दिया।

सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर में पूर्व से पश्चिम की ओर ‘ट्रेड विंड्स’ चलती हैं। ये हवाएं समुद्र के गर्म पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की ओर धकेलती हैं। इसके परिणामस्वरूप इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया क्षेत्र में अधिक वर्षा होती है।

लेकिन जब एल नीन्यो की स्थिति बनती है, तो ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। इससे समुद्र का गर्म पानी वापस पूर्वी हिस्से की ओर फैलने लगता है। इस बदलाव से दुनिया भर के मौसम पैटर्न में परिवर्तन होने लगता है।

वैज्ञानिक बताते हैं कि यह केवल समुद्र के तापमान का बदलाव नहीं है बल्कि वैश्विक वायुमंडलीय प्रणाली का एक बड़ा परिवर्तन होता है, जिसका असर हजारों किलोमीटर दूर भारत जैसे देशों तक महसूस किया जाता है।

भारत में सुपर अल नीनो के संभावित प्रभाव कई स्तरों पर दिखाई दे सकते हैं।

सबसे पहला असर मानसून पर पड़ सकता है। कमजोर बारिश का सीधा असर खेती पर होगा। धान, गन्ना, सोयाबीन और दालों जैसी फसलें वर्षा पर निर्भर होती हैं। यदि पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो उत्पादन घट सकता है।

इसका दूसरा असर खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है। कृषि उत्पादन घटने से सब्जियों और अनाज की कीमतों में वृद्धि हो सकती है।

तीसरा असर स्वास्थ्य क्षेत्र पर दिख सकता है। अधिक तापमान और लंबे समय तक चलने वाली लू बुजुर्गों, बच्चों और बाहर काम करने वाले मजदूरों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।

वैश्विक स्तर पर भी इसके प्रभाव देखे जा सकते हैं। अमेरिका में बाढ़, ऑस्ट्रेलिया में जंगलों की आग, अफ्रीका में सूखा और एशियाई देशों में चरम मौसम की घटनाएं बढ़ सकती हैं।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और कई अंतरराष्ट्रीय जलवायु संस्थाएं लगातार समुद्री तापमान और मौसमी संकेतों की निगरानी कर रही हैं। मौसम विशेषज्ञों ने कहा है कि एल नीन्यो के विकास की स्थिति पर लगातार अध्ययन किया जा रहा है और मानसून के आकलन में इसे महत्वपूर्ण कारक माना जा रहा है।

जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि एल नीन्यो अकेले समस्या नहीं है। यदि यह ग्लोबल वार्मिंग के साथ मिल जाता है तो इसके प्रभाव और गंभीर हो सकते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार बढ़ते वैश्विक तापमान ने मौसम घटनाओं को पहले की तुलना में अधिक अनिश्चित और खतरनाक बना दिया है।

सुपर अल नीनो का खतरा केवल एक मौसमी घटना नहीं बल्कि जलवायु परिवर्तन के बड़े संकट का संकेत भी माना जा रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया लगातार रिकॉर्ड गर्मी देख रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ते कार्बन उत्सर्जन ने प्राकृतिक मौसम चक्रों को अधिक तीव्र बना दिया है।

यदि एल नीन्यो पहले की तुलना में अधिक शक्तिशाली हो रहा है, तो इसके पीछे मानवीय गतिविधियों की भूमिका पर भी गंभीर चर्चा हो रही है।

भारत जैसे देश, जहां बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है, वहां ऐसी परिस्थितियां आर्थिक और सामाजिक दोनों चुनौतियां पैदा कर सकती हैं।

जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में मौसम पूर्वानुमान प्रणाली को और मजबूत करने तथा जल संरक्षण पर अधिक निवेश की आवश्यकता होगी।

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस बार निश्चित रूप से सुपर अल नीनो बनेगा या नहीं, लेकिन वैज्ञानिक संकेत चिंता बढ़ाने वाले हैं। यदि स्थिति गंभीर हुई तो इसका असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि अर्थव्यवस्था, कृषि, स्वास्थ्य और आम लोगों के जीवन पर भी दिखाई देगा।

विशेषज्ञ मानते हैं कि बदलते मौसम के इस दौर में केवल सरकारी तैयारी पर्याप्त नहीं होगी। जल संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और गर्मी से बचाव के उपायों को भी प्राथमिकता देनी होगी। आने वाले महीनों में वैज्ञानिकों की रिपोर्ट और मौसम विभाग की निगरानी बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है।

1. एल नीन्यो क्या होता है?
एल नीन्यो एक जलवायु प्रक्रिया है जिसमें प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है और इससे वैश्विक मौसम प्रभावित होता है।

2. सुपर अल नीनो क्या है?
जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस या अधिक बढ़ जाए, तो उसे सुपर एल नीन्यो कहा जाता है।

3. भारत पर इसका क्या असर पड़ सकता है?
कमजोर मानसून, अधिक गर्मी, सूखा और कृषि उत्पादन में गिरावट जैसी स्थितियां बन सकती हैं।

4. क्या सुपर अल नीनो हर साल आता है?
नहीं, यह बहुत कम बार आता है और इसकी तीव्रता भी अलग-अलग होती है।

5. क्या ग्लोबल वार्मिंग और एल नीनो जुड़े हैं?
वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग एल नीन्यो के प्रभाव को और अधिक गंभीर बना सकती है।